Word-Meaning: - [१] यह शरीर - रथ 'वात-पित्त-कफ' रूप तीन पृष्ठों [आधारों] वाला होने से 'त्रिपृष्ठ ' कहाता है। यह उत्तम 'इन्द्रियों, मन व बुद्धि' रूप स्थिति स्थानोंवाला होने से 'त्रिवन्धुर' कहलाता है, तीन सुन्दर स्थानोंवाला [वन्धुर-beautiful ] । इस (त्रिपृष्ठे) = तीन पृष्ठोंवाले, (त्रिवन्धुरे) = तीन सुन्दर स्थानोंवाले (रथे) = शरीर रथ में (तम्) = उस सोम को (युञ्जन्ति) = युक्त करते हैं। इस सोम को विनष्ट होने से बचाकर शरीर में ही सुरक्षित करते हैं। इसे शरीर रथ में इसलिए सुरक्षित करते हैं कि (यातवे) = इसके द्वारा वे प्रभु की ओर जाने के लिये समर्थ हों। [२] इस सोम को वे (ऋषीणाम्) = मन्त्रद्रष्टाओं की, ज्ञानी पुरुषों की (सप्त धीतिभिः) = [ धीति devotion] सात छन्दों से युक्त वेदवाणियों से होनेवाली उपासनाओं के द्वारा शरीर रथ में युक्त करते हैं । वस्तुतः प्रभु की उपासना ही सोम को शरीर में सुरक्षित करने का प्रमुख साधन है। शरीर में सुरक्षित हुआ-हुआ सोम शरीर - रथ को 'त्रिपृष्ठ व त्रिवन्धुर' बनाता है। यह रथ हमें प्रभु प्राप्ति के मार्ग पर ले चलता है ।
Connotation: - भावार्थ- सोमरक्षण द्वारा हम इस शरीर - रथ को दृढ़ व सुन्दर बनायें। सात छन्दों द्वारा होनेवाली उपासनायें ही सोमरक्षण का साधन बनती हैं। ऐसा होने पर यह शरीर रथ हमें प्रभु की ओर ले चलता है ।