Go To Mantra
Viewed 388 times

यत्सोमो॒ वाज॒मर्ष॑ति श॒तं धारा॑ अप॒स्युव॑: । इन्द्र॑स्य स॒ख्यमा॑वि॒शन् ॥

English Transliteration

yat somo vājam arṣati śataṁ dhārā apasyuvaḥ | indrasya sakhyam āviśan ||

Mantra Audio
Pad Path

यत् । सोमः॑ । वाज॑म् । अर्ष॑ति । श॒तम् । धाराः॑ । अ॒प॒स्युवः॑ । इन्द्र॑स्य । स॒ख्यम् । आ॒ऽवि॒शन् ॥ ९.५६.२

Rigveda » Mandal:9» Sukta:56» Mantra:2 | Ashtak:7» Adhyay:1» Varga:13» Mantra:2 | Mandal:9» Anuvak:2» Mantra:2


ARYAMUNI

Word-Meaning: - (यत् सोमः वाजम् अर्षति) जो परमात्मा बल का प्रदान करता है इससे (अपस्युवः) कर्मयोगी लोग (इन्द्रस्य सख्यम् आविशन्) परमैश्वर्यवाले उस परमात्मा के मैत्रीभाव को प्राप्त होते हुए (शतं धाराः) उसके दिये हुए बल और आनन्द की अनेक धाराओं का उपभोग करते हैं ॥२॥
Connotation: - वास्तव में परमात्मा कोई मित्र या अमित्र नहीं। जो लोग परमात्मा की आज्ञापालन करने से उसके अनुकूल चलते हैं, उनसे वह स्नेह करता है, इसलिए वे मित्र कहलाते हैं और प्रतिकूलवर्ती लोग स्नेह के पात्र नहीं होते, इसलिए अमित्र कहलाते हैं, इसीलिए यहाँ मित्र शब्द आया है। कुछ मानुषी मैत्री के भाव से नहीं ॥२॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

शक्ति-यज्ञ - प्रभु प्राप्ति

Word-Meaning: - [१] (यत्) = जब (सोमः) = शरीर में उत्पन्न हुआ हुआ सोम (वाजम्) = शक्ति को (अर्षति) = [गमयति] प्राप्त कराता है, तो (शतं धारा:) = रस सोम की ये (शतशः) = धारणशक्तियाँ (अपस्युवः) = [अपस् +यु] कर्म की कामनावाली होती हैं। सोम की ये धारणशक्तियाँ हमें यज्ञादि कर्मों में प्रवृत्त करती हैं। सोमी पुरुष सदा यज्ञों की कामनावाला होता है। [२] इन यज्ञों के द्वारा उस यज्ञरूप प्रभु की उपासना करती हुई ये सोम धारायें इन्द्रस्य उस परमैश्वर्यशाली प्रभु की (सख्यम्) = मित्रता में (आविशन्) = प्रवेश करती हैं। हमें प्रभु की मित्र बनाती हैं।
Connotation: - भावार्थ- सोमरक्षण से [क] शक्ति बढ़ती है [ख] हमारा झुकाव यज्ञों की ओर होता है, [ग] हम प्रभु को प्राप्त होते हैं ।

ARYAMUNI

Word-Meaning: - (यत् सोमः वाजम् अर्षति) यो हि जगदीश्वरः बलं प्रददाति अतः (अपस्युवः) कर्मयोगिजनाः (इन्द्रस्य सख्यम् आविशन्) परमैश्वर्यवतस्तस्य परमात्मनो मैत्रीभावं प्राप्नुवन्तः (शतं धाराः) तेनैव प्रदत्तानि बलानि आमोदधाराश्चोपभुञ्जन्ते ॥२॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - When Soma releases the divine energy and enthusiasm of life, men of initiative and creativity enjoying friendship and communion with divinity experience the ecstasy of life flowing in a hundred streams.