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परि॑ द्यु॒क्षः स॒नद्र॑यि॒र्भर॒द्वाजं॑ नो॒ अन्ध॑सा । सु॒वा॒नो अ॑र्ष प॒वित्र॒ आ ॥

English Transliteration

pari dyukṣaḥ sanadrayir bharad vājaṁ no andhasā | suvāno arṣa pavitra ā ||

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Pad Path

परि॑ । द्यु॒क्षः । स॒नत्ऽर॑यिः । भर॑त् । वाज॑म् । नः॒ । अन्ध॑सा । सु॒वा॒नः । अ॒र्ष॒ । प॒वित्रे॑ । आ ॥ ९.५२.१

Rigveda » Mandal:9» Sukta:52» Mantra:1 | Ashtak:7» Adhyay:1» Varga:9» Mantra:1 | Mandal:9» Anuvak:2» Mantra:1


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ARYAMUNI

अब सदुपदेश का वर्णन करते हैं।

Word-Meaning: - हे परमात्मन् ! आप (परि द्युक्षः) सर्वोपरि प्रकाशमान हैं। आप (नः) हमारे लिये (सनद्रयिः) धनादिकों को देते हुए (अन्धसा) अन्नादि ऐश्वर्य के सहित (वाजम् भरत्) बल को परिपूर्ण करिये और (सुवानः) स्तुति किये जाने पर आप  (पवित्रे आ अर्ष) पवित्र अन्तःकरण में निवास करिये ॥१॥
Connotation: - परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे जिज्ञासुजनों ! तुम लोग जब अपने अन्तःकरण को पवित्र बनाकर सम्पूर्ण ऐश्वर्यों को उपलब्ध करने की जिज्ञासा अपने हृदय में उत्पन्न करोगे, तब तुम ऐश्वर्य को उपलब्ध करोगे ॥१॥
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HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

शक्ति व ज्ञानदीप्ति

Word-Meaning: - [१] (द्युक्ष:) = दीप्ति में निवास करनेवाला, ज्ञानाग्नि को दीप्त करनेवाला, यह सोम (सनद्रयिः) = ऐश्वर्यों का देनेवाला है। शरीर के सब कोशों को यह ऐश्वर्य से युक्त करता है। यह (नः) = हमारे लिये (अन्धसा) = अन्न के द्वारा (वाजम्) = शक्ति को भरत् भरता है । अन्न से रस- रुधिर आदि के क्रम से इसका उत्पादन होता है। उत्पन्न हुआ हुआ सोम हमें शक्ति-सम्पन्न करता है। मांस भक्षण से उत्पन्न हुआ हुआ सोम न तो शरीर में सुरक्षित रह पाता है और नां ही हमें शक्ति सम्पन्न करता है। [२] हे सोम ! (सुवानः) = उत्पन्न किया जाता हुआ तू (पवित्रे) = पवित्र हृदयवाले पुरुष में (आ अर्ष) = समन्तात् गतिवाला हो । हृदय की पवित्रता के होने पर यह सोम शरीर में ही सुरक्षित रहता है और उस समय यह हमें शक्ति व ज्ञान को प्राप्त कराता है।
Connotation: - भावार्थ - अन्न के आहार से उत्पन्न सोम शरीर में सुरक्षित रहता है। यह सुरक्षित सोम हमारे में शक्ति व ज्ञान का सञ्चार करता है ।
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ARYAMUNI

अथ सदुपदेशं वर्णयति।

Word-Meaning: - हे जगदीश ! भवान् (परि द्युक्षः) सर्वोपरि विराजते। स त्वं (नः) अस्मभ्यं (सनद्रयिः) धनानि ददत् (अन्धसा) सहान्नाद्यैश्वर्य्यः (वाजम्) बलं (भरत्) परिपूरय। तथा (सुवानः) स्तवनानन्तरं भवान् (पवित्रे आ अर्ष) शुद्धान्तःकरणे निवासं करोतु ॥१॥
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DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - Light of the light of heaven, treasure-hold of world’s wealth, with wealth, food and energy for body, mind and soul arise and manifest in the pure heart, inspiring it to a state of peace and benediction.