'प्रिय - हरि - पवमान - मधुश्चत्
Word-Meaning: - [१] (अव्यः) = [अवति इति अवि:] रक्षक के (वारे) = जिसमें से बुराइयों का निवारण किया गया है ऐसे हृदय में (प्रियम्) = प्रीणित करनेवाले (हरिम्) = दुःखों का हरण करनेवाले सोम को (अद्रिभि:) = [ adore ] उपासनाओं के द्वारा (परि हिन्वन्ति) = शरीर में चारों ओर प्रेरित करते हैं। जो व्यक्ति वासनाओं के आक्रमण से अपने को बचाता है वह 'अवि' है। इसके (वारे) = वार में, अशुभ वासनाओं के निवारणवाले हृदय में उपासनाओं के द्वारा सोम को शरीर में व्याप्त किया जाता है। यह सोम हरि है, सब दुःखों का हरण करनेवाला है। यह प्रिय है, शक्ति के संचार के द्वारा हमें प्रीणित करनेवाला है। [२] (पवमानम्) = यह सोम हमारे जीवनों को पवित्र करनेवाला है तथा (मधुश्चतम्) = माधुर्य को हमारे में क्षरित करनेवाला है । सोमरक्षण से हमारा जीवन मधुर बनता है ।
Connotation: - भावार्थ- सोम 'प्रिय हरि - पवमान- मधुश्श्रुत्' है। प्रभु की उपासना के द्वारा इसका रक्षण होता है ।