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प्र॒स॒वे त॒ उदी॑रते ति॒स्रो वाचो॑ मख॒स्युव॑: । यदव्य॒ एषि॒ सान॑वि ॥

English Transliteration

prasave ta ud īrate tisro vāco makhasyuvaḥ | yad avya eṣi sānavi ||

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Pad Path

प्र॒ऽस॒वे । ते॒ । उत् । ई॒र॒ते॒ । ति॒स्रः । वाचः॑ । म॒ख॒स्युवः॑ । यत् । अव्ये॑ । एषि॑ । सान॑वि ॥ ९.५०.२

Rigveda » Mandal:9» Sukta:50» Mantra:2 | Ashtak:7» Adhyay:1» Varga:7» Mantra:2 | Mandal:9» Anuvak:2» Mantra:2


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ARYAMUNI

Word-Meaning: - (यत्) जब आप (मखस्युवः अव्ये सानवि एषि) यज्ञकर्ताओं को रक्षणीय उच्च यज्ञस्थलों में प्राप्त होते हैं, तो वह ऋत्विग् लोग (ते प्रसवे) आपके प्रादुर्भूत होने से (तिस्रः वाचः उदीरते) ज्ञान कर्म और उपासना विषयक तीनों वाणियों का उच्चारण करते हैं ॥२॥
Connotation: - परमात्मा का आविर्भाव और तिरोभाव वास्तव में नहीं होता; क्योंकि वह कूटस्थ नित्य अर्थात् एकरस सदा आविनाशी है। उसका आविर्भाव तिरोभाव उसके कीर्तनप्रयुक्त कहा जा सकता है। अर्थात् जहाँ उसका कीर्तन होता है, उसका नाम आविर्भाव है और जहाँ उसका अकीर्तन है वहाँ तिरोभाव है। उक्त आविर्भाव तिरोभाव मनुष्य के ज्ञान के अभिप्राय से है। अर्थात् ज्ञानियों के हृदय में उसका आविर्भाव है और अज्ञानियों के हृदय में तिरोभाव है ॥२॥
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HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

तीनों ज्ञानवाणियों का उदीरण

Word-Meaning: - [१] हे सोम ! (ते प्रसवे) = शरीर में तेरे उत्पन्न होने पर (मखस्युवः) = यज्ञों को हमारे साथ जोड़नेवाली (तिस्रः वाचः) = ऋग्-यजु-साम रूप तीनों वाणियाँ (उदीरते) = उद्गत होती हैं । अर्थात् सोमरक्षण से हमें वह वेदज्ञान प्राप्त होता है, जो कि हमारे साथ यज्ञों को संगत करता है। [२] यह सब तब होता है (यद्) = जब कि (अव्ये) = जिसका बहुत अच्छी प्रकार रक्षण किया गया है उस (सानवि) = शिखर प्रदेश में, अर्थात् मस्तिष्क में तू (एषि) = प्राप्त होता है। शरीर में सुरक्षित हुआ- हुआ सोम ऊर्ध्वगतिवाला होकर जब मस्तिष्क में प्राप्त होता है, उस समय यह सोम ज्ञानाग्नि का ईंधन बनता है। ज्ञानाग्नि दीप्त होती है और हम ऋग्यजु-साम रूप में उच्चरित प्रभु की वाणियों को समझनेवाले होते हैं। इन वाणियों के द्वारा हमें यज्ञों का ज्ञान प्राप्त होता है ।
Connotation: - भावार्थ- सोमरक्षण से सोम की ऊर्ध्वगति होकर जब यह सोम मस्तिष्क में प्राप्त होता है। तो हमें सब ज्ञान की वाणियाँ स्पष्ट होने लगती हैं।
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ARYAMUNI

Word-Meaning: - (यत्) यदा भवान् (मखस्युवः अव्ये सानवि एषि) यज्ञकारिणां गोपनीयोच्चयज्ञस्थलेषु प्राप्तो भवति तदा ते ऋत्विजः (ते प्रसवे) भवदाविर्भावेन (तिस्रः वाचः उदीरते) ज्ञानकर्मोपासनाविषयिणीनां तिसृणां वाचामुच्चारणं कुर्वन्ति ॥२॥
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DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - When you rise and reach the pinnacle of yajna which deserves to be protected and promoted, then as you rise in intensity, the priests’ chant of the three voices of Rks, Samans and Yajus also swells to the climax.