Word-Meaning: - [१] सोम के सुरक्षित होने पर शरीर में सब व्यवस्था ठीक चलती है। मन्त्र में कहते हैं कि (नः) = हमारे (इमम्) = इस (पवमानस्य) = सोम के (यज्ञम्) = यज्ञ में (सरस्वती - इडा - मही) = सरस्वती- इडा - मही (तिस्त्रः) = तीनों (सुपेशसः) = जीवन का उत्तम निर्माण करनेवाली (देवी:) = देवियाँ (अगमन्) = आयें । 'मरणं बिन्दुपातेन जीवनं बिन्दुधारणात्' इस वाक्य के अनुसार यह जीवन 'सोम' के साथ है। इसलिए यहाँ इस जीवन को 'पवमान सोम का यज्ञ' कहा है । [२] इस सोम के सुरक्षित होने पर 'सरस्वती, इडा व मही' ये तीनों देवियाँ हमारे जीवन में आती हैं, ये तीनों 'भारती' हैं, (भारती) = हमारा उत्तमता से भरण करनेवाली हैं। निघण्टु १ । ११ में 'इडा, सरस्वती, मही' ये तीनों ही वाणी के नाम हैं। 'इडा' यह ऋग्वेद की वाणी हैं, जो सब भौतिक पदार्थों के विज्ञान को देती हुई हमें उत्तम अन्न प्राप्त कराती है, और हमारे इस अन्नमयकोश को बड़ा ठीक रखती है । 'सरस्वती' यजुर्वेद की वाणी है, जो सब यज्ञों व कर्त्तव्यों का प्रतिपादन करती हुई, हमें शिक्षित व परिष्कृत जीवनवाला बनाती है। 'मही' साम वाणी है, जो कि हमें प्रभु-पूजन कराती हुई प्रभु के समान ही महान् बनाती है । एवं ये सब वाणियाँ भारती हैं, हमारे जीवन का सुन्दर भरण करती हैं, 'सुपेशस् ' हैं। निघण्टु में भारती भी [१ । ११] वाणी का नाम है । 'इडा- सरस्वती मही' तीनों ही भारती हैं। सोम के रक्षण के होने पर ये सब हमें प्राप्त होती हैं, इनके द्वारा हमारा जीवन यज्ञ उत्तमता से चलता है ।
Connotation: - भावार्थ- सोमरक्षण के होने पर हमारे जीवनयज्ञ में 'इडा-सरस्वती मही' तीनों ही भारती देवियाँ प्राप्त होती हैं।