Go To Mantra

ब॒र्हिः प्रा॒चीन॒मोज॑सा॒ पव॑मानः स्तृ॒णन्हरि॑: । दे॒वेषु॑ दे॒व ई॑यते ॥

English Transliteration

barhiḥ prācīnam ojasā pavamānaḥ stṛṇan hariḥ | deveṣu deva īyate ||

Mantra Audio
Pad Path

ब॒र्हिः । प्रा॒चीन॑म् । ओज॑सा । पव॑मानः । स्तृ॒णन् । हरिः॑ । दे॒वेषु॑ । दे॒वः । ई॒य॒ते॒ ॥ ९.५.४

Rigveda » Mandal:9» Sukta:5» Mantra:4 | Ashtak:6» Adhyay:7» Varga:24» Mantra:4 | Mandal:9» Anuvak:1» Mantra:4


Reads 344 times

ARYAMUNI

Word-Meaning: - (बर्हिः) “बृंहतीति बर्हिः=सबसे बड़ा” परमात्मा जो (ओजसा) अपने प्रकाश से सबको (पवमानः) पवित्र करता है और (प्राचीनम्) प्रवाहरूप से अनादि संसार को (स्तृणन्) कार्य्यरूप करता हुआ (हरिः) अन्त में “हरतीति हरिः” अपने में लय कर लेता है (देवेषु) सब दिव्य वस्तुओं में (देवः) “दिव्यतीति देवः=जो सर्वोपरि दीप्तिमान् है, वह ध्यान द्वारा (ईयते) साक्षात्कार किया जाता है ॥४॥
Connotation: - वह देव, जो सब दिव्य वस्तुओं में दिव्यस्वरूप है, वही एकमात्र उपासनीय है, अन्य नहीं। इस देव शब्द की व्याख्या “एषो देवः प्रदिशोऽनु सर्वा” यजु० ३२।४॥ इस वेदवाक्य में स्पष्ट रीति से पाया जाती है और “एको देवः सर्वभूतेषु गूढः” श्वे०।६।११। इत्यादि उपनिषद्वाक्यों में इसी देव का वर्णन पाया जाता है। इसी देव का इस मन्त्र में जगत् की उत्पत्ति, स्थिति तथा प्रलय का एकमात्र हेतु कथन किया है। ज्ञात होता है कि “यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते येन जातानि जीवन्ति यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति तद् विजिज्ञासस्व तद् ब्रह्म” तै०। ३।१। इत्यादि वाक्यों में जगत् की उत्पत्ति स्थिति तथा प्रलय का हेतु जो ब्रह्मा को माना गया है, वह इसी वेदमन्त्र के आधार पर है। केवल भेद इतना है कि उपनिषद्वाक्यों में ब्रह्म शब्द है, यहाँ बर्हि शब्द है। ब्रह्म और बर्हि दोनों एकार्थवाची शब्द हैं, क्योंकि दोनों “बृहि वृद्धौ” इस धातु से सिद्ध होते हैं ॥ जिन लोगों ने बर्हि के माने कुशासन और हरिः के माने यहाँ हरे रङ्गवाले सोम के किये हैं, उन्होंने अत्यन्त भूल की है, क्योंकि उपक्रम-उपसंहार में यहाँ परमात्मा का वर्णन है और परमात्मवाची शब्द ही इस मण्डल में अधिकता से पाये जाते हैं ॥४॥
Reads 344 times

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

'देव' सोम

Word-Meaning: - [१] यह सोम (प्राचीनम्) = [ प्र अञ्च्] सदा अग्रगति की भावनावाले (बर्हिः) = वासनाशून्य हृदय को जिसने वासनाओं का उद्धर्हण कर दिया गया है उस हृदय को (ओजसा स्तृणन्) = ओजस्विता से आच्छादित करता हुआ (पवमानः) = हमें पूर्ण पवित्र बनाता है तथा (हरिः) = हमारे दुःखों व पापों का हरण करनेवाला होता है। [२] यह (देवः) = हमारे सब रोगों को जीतनेवाला तथा प्रकाशमय सोम (देवेषु) = देववृत्तिवाले पुरुषों में (ईयते) = गति करता है। देववृत्तिवाले पुरुषों में ही यह सुरक्षित रहता है।
Connotation: - भावार्थ - यह सोम हमें 'ओजसी, पवित्र, निष्पाप व सुखी तथा प्रकाशमय जीवनवाला' बनाता है।
Reads 344 times

ARYAMUNI

Word-Meaning: - (बर्हिः) सर्वोत्कृष्टः परमात्मा (ओजसा) स्वतेजसा सर्वं (पवमानः) पुनानः (प्राचीनम्) प्रवाहरूपेण संसारं (स्तृणन्) कार्यरूपेण विपरिणमयन् (हरिः) अन्ते स्वस्मिन् अन्तर्भावयति (देवेषु) सर्वदिव्यवस्तुषु (देवः) सर्वाधिकद्योतमानः स एव ध्यानेन (ईयते) साक्षात्क्रियते ॥४॥
Reads 344 times

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - Self-refulgent lord infinite, pure and purifying, pervading the timeless world of existence by his lustre and majesty and withdrawing it unto himself is manifested and operative in all divine things of the universe and is, as such, realised through them.