विश्व॑स्मा॒ इत्स्व॑र्दृ॒शे साधा॑रणं रज॒स्तुर॑म् । गो॒पामृ॒तस्य॒ विर्भ॑रत् ॥
English Transliteration
Mantra Audio
viśvasmā it svar dṛśe sādhāraṇaṁ rajasturam | gopām ṛtasya vir bharat ||
Pad Path
विश्व॑स्मै । इत् । स्वः॑ । दृ॒शे । साधा॑रणम् । र॒जः॒ऽतुर॑म् । गो॒पाम् । ऋ॒तस्य॑ । विः । भ॒र॒त् ॥ ९.४८.४
Rigveda » Mandal:9» Sukta:48» Mantra:4
| Ashtak:7» Adhyay:1» Varga:5» Mantra:4
| Mandal:9» Anuvak:2» Mantra:4
Reads 348 times
ARYAMUNI
Word-Meaning: - (विश्वस्मै इत् स्वर्दृशे) हे परमात्मन् ! आप सब ही दिव्यगुणसम्पन्न विद्वानों के लिये (साधारणम्) समान हैं और (रजस्तुरम्) प्रधानतया रजोगुण के प्रेरक हैं (ऋतस्य गोपाम्) तथा यज्ञ के रक्षिता हैं और (विः) सर्वव्यापक होकर (भरत्) संसार का पालन करते हैं ॥४॥
Connotation: - जिस प्रकार प्रकृति के तीनों गुणों में से रजोगुण की प्रधानता है अर्थात् रजोगुण सत्त्वगुण और तमोगुण को धारण किये हुए रहता है, इसी प्रकार से परमात्मा के सत्, चित् और आनन्द इन तीनों गुणों में से चित् की प्रधानता है। अर्थात् चित् ही सत् और आनन्द का भी प्रकाशक है। इसी प्रकार परमात्मा के तेजोमय गुण को प्रधान समझकर उसके उपलब्ध करने की चेष्टा करनी चाहिए ॥४॥
Reads 348 times
HARISHARAN SIDDHANTALANKAR
'वि' [गतिशील, यज्ञशील] का सोम-भरण
Word-Meaning: - [१] (वि:) = [goer, sacrificer] गतिशील व त्यागशील [यज्ञादि उत्तम कर्मों को करनेवाला] पुरुष (इत्) = निश्चय से (विश्वस्मा) = सम्पूर्ण (स्वर्दृशे) = ज्ञान की प्राप्ति के लिये सोम का भरत्-अपने अन्दर धारण करता है। 'गतिशीलता व त्यागशीलता' सोमरक्षण के लिये सहायक बनती हैं। सुरक्षित सोम हमारी ज्ञानवृद्धि का कारण बनता है। [२] यह 'वि' उस सोम का धारण करता है जो कि (साधारणम्) = सब प्राणियों में समान रूप से प्रभु द्वारा स्थापित किया गया है। (रजस्तुरम्) = जो सोम सुरक्षित होने पर राजसभावों को विनष्ट करनेवाला है। और जो सोम (ऋतस्य गोपाम्) = हमारे जीवनों में ऋत का रक्षक है। सोम के रक्षण से हमारे जीवनों में सब चीज ठीक ही होती है।
Connotation: - भावार्थ- गतिशीलता व त्यागशीलता सोमरक्षण के साधन हैं। सुररिक्षत सोम हमारे अन्दर ऋत का रक्षण करता है। यह राजसभावों को विनष्ट करता है और हमारे ज्ञान को बढ़ाता है ।
Reads 348 times
ARYAMUNI
Word-Meaning: - (विश्वस्मै इत् स्वर्दृशे) हे जगदीश्वर ! भवान् दिव्यगुणसमपन्नाय सर्वस्मै विदुषे (साधारणम्) समानोऽस्ति। अथ च (रजस्तुरम्) प्रधानतया रजोगुणप्रेरकोऽस्ति। (ऋतस्य गोपाम्) तथा यज्ञरक्षकश्चास्ति। अथ च (विः) सर्वत्र व्यापकतया (भरत्) जगतः पालनं करोति ॥४॥
Reads 348 times
DR. TULSI RAM
Word-Meaning: - The sage and scholar of lofty vision and imagination, in order that all visionaries of the world may perceive your heavenly majesty, communicates his experience of your presence who are present everywhere, who give motion to the energy of nature in the cosmic dynamics and who rule and protect the laws of eternal truth which govern the course of existence.
