Word-Meaning: - [१] (यः) = जो सोम (अत्यः इव) = सततगामी अश्व के समान है, अर्थात् यह हमें शक्ति सम्पन्न बनाकर खूब ही गतिमय करता है। यह सोम (गोभिः) = ज्ञान की वाणियों से (मृज्यते) = शुद्ध किया जाता है। यदि हम स्वाध्याय में लगते हैं तो वासनाओं से आक्रान्त न होने से यह सोम शुद्ध बना रहता है। यह (मदाय) = आनन्द व उल्लास के लिये होता है। (हर्यतः) = गतिशील व कान्त होता है । हमें गतिशील बनाता है, चाहने योग्य होता है । [२] (तम्) = उस सोम को (गीर्भिः) = स्तुति-वाणियों के द्वारा वासयामसि अपने अन्दर धारण करते हैं। प्रभु-स्तवन करते हैं और प्रभु-स्तवन द्वारा सोम का रक्षण कर पाते हैं। यह प्रभु स्मरण हमें वासनाओं से बचाता है, और इस प्रकार सोम को हमारे में बसाता है ।
Connotation: - भावार्थ - स्वाध्याय [गोभिः व स्तुति [गीर्भिः]] सोमरक्षण के साधन हैं।