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प्र ये गावो॒ न भूर्ण॑यस्त्वे॒षा अ॒यासो॒ अक्र॑मुः । घ्नन्त॑: कृ॒ष्णामप॒ त्वच॑म् ॥

English Transliteration

pra ye gāvo na bhūrṇayas tveṣā ayāso akramuḥ | ghnantaḥ kṛṣṇām apa tvacam ||

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Pad Path

प्र । ये । गावः॑ । न । भूर्ण॑यः । त्वे॒षाः । अ॒यासः॑ । अक्र॑मुः । घ्नन्तः॑ । कृ॒ष्णाम् । अप॑ । त्वच॑म् ॥ ९.४१.१

Rigveda » Mandal:9» Sukta:41» Mantra:1 | Ashtak:6» Adhyay:8» Varga:31» Mantra:1 | Mandal:9» Anuvak:2» Mantra:1


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ARYAMUNI

अब परमात्मा की रचना का महत्त्व वर्णन करते हैं।

Word-Meaning: - (ये गावः न) पृथिव्यादि लोकों के समान जो लोक (भूर्णयः) शीघ्र गतिशील हैं (त्वेषाः) जो दीप्तिमान् और (अयासः) वेगवाले (कृष्णाम् त्वचम्) महा गूढ़ अन्धकार को (अपघ्नन्तः प्राक्रमुः) नष्ट करते हुये प्रक्रमण करते हैं ॥१॥
Connotation: - परमात्मा सब लोक-लोकान्तरों को उत्पन्न करता है, उसी की सत्ता से सब पृथिव्यादिलोक गति कर रहे हैं ॥१॥
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HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

दीप्त गतिशील निर्मल

Word-Meaning: - [१] (ये) = जो सोम (गावः न) = [अर्थं गमयन्ति] जैसे पदार्थों का ज्ञान देनेवाले हैं, उसी प्रकार (भूर्णयः) = हमारा भरण करनेवाले हैं। सोम ज्ञानाग्नि का ईंधन बनकर बुद्धि को सूक्ष्म बनाता है। इस सूक्ष्म बुद्धि के द्वारा हम तत्त्वज्ञान को प्राप्त करते हैं। इस प्रकार ये सोम हमारे लिये 'गावः' अर्थों के गमक होते हैं। शरीर में शक्ति का संचार करते हुए ये हमारा भरण करते हैं । [२] (त्वेषाः) = ये सोम ज्ञानदीप्त हैं, हमारे ज्ञान को दीप्त करते हैं। (अयासः) = ये सोम गमनशील हैं। ज्ञानेन्द्रियों के दृष्टिकोण से ये 'त्वेष' हैं, कर्मेन्द्रियों के दृष्टिकोण से 'अयासः ' हैं। ऐसे ये सोम (प्र अक्रमुः) = शरीर में गतिवाले होते हैं । [३] ये सोम (कृष्णां त्वचम्) = हृदय पर आये हुए वासना के मलिन आवरण को (अपघ्नन्तः) = दूर विनष्ट करनेवाले हैं। मस्तिष्क को ये सोम दीप्त बनाते हैं, शरीर को गतिशील तथा हृदय को वासना के मलिन आवरण से रहित ।
Connotation: - भावार्थ- सुरक्षित सोम हमें 'दीप्त गतिशील व निर्मल' बनाते हैं।
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ARYAMUNI

अथ परमात्मनो रचनामहत्त्वं वर्ण्यते।

Word-Meaning: - (ये गावः न) पृथिव्यादिलोकसदृशा ये लोकाः (भूर्णयः) शीघ्रगामिनः (त्वेषाः) दीप्तिमन्तः (अयासः) वेगवन्तः (कृष्णाम् त्वचम्) नीरन्ध्रान्धकारं (अपघ्नन्तः प्राक्रमुः) नाशयन्तः प्रक्राम्यन्ति ॥१॥
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DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - We adore the ceaseless radiations of divinity which, like restless rays of the sun, blazing with lustrous glory, move and shower on the earth and dispel the dark cover of the night.