'विश्वायु' रयि की प्राप्ति
Word-Meaning: - [१] हे (इन्दो) = सोम ! (नः) = हमारे लिये (रयिम्) = धन को (आभर) = प्राप्त करा, जो (अश्विनम्) = उत्तम इन्द्रियाश्वोंवाला है तथा (विश्वायुम्) = पूर्ण जीवन को देनेवाला है तथा (चित्रम्) = अद्भुत है अथवा 'चिती संज्ञाते' उत्तम ज्ञान से युक्त है। वस्तुतः वही धन उत्तम है जो कि - [क] ज्ञान से युक्त है, [ख] इन्द्रियों को शक्तिशाली बनानेवाला है तथा [ग] जीवन को पूर्ण बनाता है। [२] इस प्रकार के ऐश्वर्य को प्राप्त कराके (अथा) = अब (नः) = हमें (वस्यसः) = प्रशस्त जीवनवाला (कृधि) = कर । वस्तुतः जीवन का सौन्दर्य इसी में है कि वह ज्ञान सम्पन्न हो, इन्द्रियाँ सशक्त हों, जीवन यौवन में ही समाप्त न हो जाए ।
Connotation: - भावार्थ- सोमरक्षण से [क] ज्ञान बढ़ता है, [ख] इन्द्रियाँ सशक्त होती हैं, [ग] जीवन पूर्ण बनता है । इस प्रकार यह हिरण्य स्तूप सोम की ऊर्ध्वगति करता हुआ 'असित' बनता है, विषयों से बद्ध [सित] नहीं होता 'काश्यप'- ज्ञानी बनता है और 'देवल' दिव्य गुणों का आदान करनेवाला होता है। इसी 'असित काश्यप देवल' ऋषि का अगला सूक्त है। यह सोम का स्तवन करता हुआ कहता है कि-