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स वृ॑त्र॒हा वृषा॑ सु॒तो व॑रिवो॒विददा॑भ्यः । सोमो॒ वाज॑मिवासरत् ॥

English Transliteration

sa vṛtrahā vṛṣā suto varivovid adābhyaḥ | somo vājam ivāsarat ||

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Pad Path

सः । वृ॒त्र॒ऽहा । वृषा॑ । सु॒तः । व॒रि॒वः॒ऽवित् । अदा॑भ्यः । सोमः॑ । वाज॑म्ऽइव । अ॒स॒र॒त् ॥ ९.३७.५

Rigveda » Mandal:9» Sukta:37» Mantra:5 | Ashtak:6» Adhyay:8» Varga:27» Mantra:5 | Mandal:9» Anuvak:2» Mantra:5


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ARYAMUNI

Word-Meaning: - (वृत्रहा) अज्ञानों का नाशक (वृषा) कामनाओं की वर्षा करनेवाला (सुतः) स्वयंसिद्ध (वरिवोवित्) ऐश्वर्यों का देनेवाला (अदाभ्यः) अदम्भनीय (सः सोमः) वह परमात्मा (वाजम् इव असरत्) शक्ति की नाईं व्याप्त हो रहा है ॥५॥
Connotation: - जिस प्रकार सूर्य (वृत्र) मेघों को छिन्न-भिन्न करके धरातल को जल से सुसिञ्चित कर देता है, इसी प्रकार परमात्मा सब प्रकार के आवरणों को छिन्न-भिन्न करके अपने ज्ञान का प्रकाश कर देता है ॥५॥
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HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

वृत्रहा - वृषा

Word-Meaning: - [१] (सः) = वह (सुतः) = उत्पन्न हुआ हुआ सोम (वृत्रहा) = वासना को नष्ट करनेवाला है। ज्ञान की आवरणभूत वासना को विनष्ट करके यह ज्ञान को दीप्त करता है । (वृषा) = शक्ति को देनेवाला है । (वरिवोवित्) = सब वरणीय धनों को प्राप्त कराता है। (अदाभ्यः) = न हिंसित होनेवाला है। शरीर में सोम के सुरक्षित होने पर यह रोगकृमियों का विनाश करता है और इस प्रकार यह हमें रोगों से हिंसित नहीं होने देता। [२] (सोम:) = यह सोम [वीर्यशक्ति] इस प्रकार शरीर में (असरत्) = गतिवाला होता है, (इव) = जैसे कि एक अश्व (वाजम्) = संग्राम में गति करता है। यह सोम इस संग्राम में शत्रुभूत रोगकृमियों को तथा काम-क्रोध आदि वासनाओं को विनष्ट करनेवाला होता है ।
Connotation: - भावार्थ- सुरक्षित सोम ज्ञान की आवरणभूत वासना को विनष्ट करता है। शरीर में शक्ति को देता है। वरणीय धनों को प्राप्त कराता है और हमें हिंसित नहीं होने देता।
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ARYAMUNI

Word-Meaning: - (वृत्रहा) अज्ञानच्छेदकः (वृषा) सर्वकामदः (सुतः) स्वयंसिद्धः (वरिवोवित्) विभूतिप्रदः (अदाभ्यः) अदम्भनीयः (सः सोमः) सः परमात्मा (वाजम् इव असरत्) शक्तिरिव व्याप्नोति ॥५॥
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DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - Soma, destroyer of darkness, generous, self- manifestive, self-revealed and self discovered, lord giver of the best of wealth and excellence of the world, fearless and undaunted, pervades and vibrates in existence as Shakti, divine omnipotent energy.