विश्वो॒ यस्य॑ व्र॒ते जनो॑ दा॒धार॒ धर्म॑ण॒स्पते॑: । पु॒ना॒नस्य॑ प्र॒भूव॑सोः ॥
English Transliteration
Mantra Audio
viśvo yasya vrate jano dādhāra dharmaṇas pateḥ | punānasya prabhūvasoḥ ||
Pad Path
विश्वः॑ । यस्य॑ । व्र॒ते । जनः॑ । दा॒धार॑ । धर्म॑णः । पतेः॑ । पु॒ना॒नस्य॑ । प्र॒भुऽव॑सोः ॥ ९.३५.६
Rigveda » Mandal:9» Sukta:35» Mantra:6
| Ashtak:6» Adhyay:8» Varga:25» Mantra:6
| Mandal:9» Anuvak:2» Mantra:6
Reads 477 times
ARYAMUNI
Word-Meaning: - (यस्य) जिस (धर्मणस्पतेः) धर्म को पालन करनेवाले (पुनानस्य) संसार को पवित्र करनेवाले (प्रभूवसोः) अनन्त ऐश्वर्यवाले परमात्मा की (व्रते) भक्ति में (विश्वः) सम्पूर्ण ऐश्वर्याभिलाषियों का गण (मनः दाधार) अपने-२ मन को धारण करता है, उस परमात्मा को अपने हृदय में बसाते हैं ॥६॥
Connotation: - परमात्मा के नियम में ही सब सूर्य्यादि पदार्थ अपने-अपने धर्म्मों को धारण करते हैं अर्थात् उसके नियमों का कोई भी उल्लङ्घन नहीं कर सकता। उस परमात्मा के महत्त्व को स्वहृदय में धारण करना प्रत्येक पुरुष का कर्तव्य है ॥६॥ यह ३५ वाँ सूक्त और २५ वाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
Reads 477 times
HARISHARAN SIDDHANTALANKAR
धर्मणस्पति-प्रभूवसु
Word-Meaning: - [१] (विश्वो जनः) = सब मनुष्य (यस्य व्रते) = जिस सोम के व्रत में (दाधार) = अपना धारण करते हैं। जिस समय सोमरक्षण के लिये व्रत में चलते हैं, तो उस समय ये मनुष्य अपना धारण करनेवाले बनते हैं । [२] यह सोम (धर्मणस्पते) = धारणात्मक कर्मों का रक्षक है, (पुनानस्य) = पवित्र करनेवाला है तथा (प्रभूवसोः) = प्रभावयुक्त वसुओंवाला है। सोमरक्षण से मनुष्य सदा धारणात्मक कर्मों को करने की वृत्तिवाला होता है इस सोम के रक्षण से जीवन पवित्र बनता है, शरीर नीरोग तथा मन निर्मल । सोमरक्षण करनेवाला मनुष्य निवास के लिये आवश्यक सब तत्त्वों से युक्त होता है और सामर्थ्यवान् बनता है ।
Connotation: - भावार्थ- हम सोम का रक्षण करते हैं, तो यह [क] हमें धारणात्मक कर्मों में प्रवृत्त करता है, [ख] हमारे जीवनों को पवित्र बनाता है, [ग] हमें प्रभाव सम्पन्न बनाता है व निवास के लिये आवश्यक तत्त्वों को प्राप्त कराता है । 'प्रभूवसु' ऋषि ही अगले सूक्त में कहता है-
Reads 477 times
ARYAMUNI
Word-Meaning: - (यस्य) यस्य (धर्मणस्पतेः) धर्मरक्षकस्य (पुनानस्य) लोकस्य पवित्रयितुः (प्रभूवसोः) अनन्तैश्वर्यस्य परमात्मनः (व्रते) भक्तौ (विश्वः) सर्वैश्वर्याभिलाषिणः (मनः दाधार) स्वस्वमनांसि धारयन्ति तं परमात्मानं स्वहृदि धारयामः ॥६॥ इति पञ्चत्रिंशत्तमं सूक्तं पञ्चविंशो वर्गश्च समाप्तः ॥
Reads 477 times
DR. TULSI RAM
Word-Meaning: - We adore and glorify Soma, lord of universal wealth, honour and excellence, ordainer and guardian of Dharma and all purifier, who holds and sustains the entire world of humanity in his law of existence.
