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अ॒भीमृ॒तस्य॑ वि॒ष्टपं॑ दुह॒ते पृश्नि॑मातरः । चारु॑ प्रि॒यत॑मं ह॒विः ॥

English Transliteration

abhīm ṛtasya viṣṭapaṁ duhate pṛśnimātaraḥ | cāru priyatamaṁ haviḥ ||

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Pad Path

अ॒भि । ई॒म् । ऋ॒तस्य॑ । वि॒ष्टप॑म् । दु॒ह॒ते । पृश्नि॑ऽमातरः । चारु॑ । प्रि॒यऽत॑मम् । ह॒विः ॥ ९.३४.५

Rigveda » Mandal:9» Sukta:34» Mantra:5 | Ashtak:6» Adhyay:8» Varga:24» Mantra:5 | Mandal:9» Anuvak:2» Mantra:5


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ARYAMUNI

Word-Meaning: - (पृश्निमातरः) कर्मयोगी विद्वान् (ऋतस्य विष्टपम् ईम्) सत्य के स्थान परमात्मा से (चारु) सुन्दर (प्रियतमम्) अतिप्रिय (हविः) शुभ कर्म की (अभिदुहते) भली प्रकार प्रार्थना करते हैं ॥५॥
Connotation: - कर्म्मयोगी पुरुष अपने कर्म्मों से उसका साक्षात्कार अर्थात् उपासनाकर्म्म द्वारा उसकी सत्ता का लाभ करते हैं ॥५॥
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HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

प्रियतम हवि

Word-Meaning: - [१] (पृश्निमातरः) = ['संस्प्रष्टा भासां' नि०] ज्ञान- ज्योतियों का स्पर्श करनेवाले [पृश्नि] निर्माण के कार्यों में लगनेवाले [मातरः ] लोग ईम् = निश्चय से इस सोम को अभिदुहते शरीर में शक्ति के लिये तथा मस्तिष्क में ज्ञानाग्नि की दीप्ति के लिये अपने अन्दर प्रपूरित करते हैं । [२] उस सोम को अपने अन्दर प्रपूरित करते हैं, जो कि (ऋतस्य विष्टपम्) = ऋत का लोक है, ऋत अर्थात् यज्ञ का आधार है । सोम के रक्षित होने पर वृत्ति यज्ञिय बनती है । (चारु) = यह सोम सुन्दर है, चरणीय है, भक्षणीय है, शरीर के ही अन्दर व्यापन के योग्य है । यह (प्रियतमं हविः) = प्रियतम हवि है, शरीर में सुरक्षित होने पर अधिक से अधिक प्रीणित करनेवाला है । यह जीवनयज्ञ की सर्वोत्तम हवि है । इसे शरीर में सुरक्षित रखना ही चाहिये ।
Connotation: - भावार्थ - ज्ञानी व निर्माण के कार्य में लगे हुए व्यक्ति इस सोम का रक्षण करते हैं। सुरक्षित हुआ हुआ यह सोम जीवन को ऋतमय बनाता है।
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ARYAMUNI

Word-Meaning: - (पृश्निमातरः) कर्मयोगिनो विद्वांसः (ऋतस्य विष्टपम् ईम्) सत्यास्पदं परमात्मानं (चारु) सुन्दरम् (प्रियतमम्) अतिप्रियं (हविः) शुभकर्म (अभिदुहते) अभ्यर्थयन्ते ॥५॥
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DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - The infinite forms of versatile nature imbibe and assimilate the spirit of divinity on top of the truth and felicity of existence, and that is the dearest and most beautiful divine gift worthy of choice and acceptance.