सु॒ता इन्द्रा॑य वा॒यवे॒ वरु॑णाय म॒रुद्भ्य॑: । सोमा॑ अर्षन्ति॒ विष्ण॑वे ॥
English Transliteration
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sutā indrāya vāyave varuṇāya marudbhyaḥ | somā arṣanti viṣṇave ||
Pad Path
सु॒ताः । इन्द्रा॑य । वा॒यवे॑ । वरु॑णाय । म॒रुत्ऽभ्यः॑ । सोमाः॑ । अ॒र्ष॒न्ति॒ । विष्ण॑वे ॥ ९.३३.३
Rigveda » Mandal:9» Sukta:33» Mantra:3
| Ashtak:6» Adhyay:8» Varga:23» Mantra:3
| Mandal:9» Anuvak:2» Mantra:3
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ARYAMUNI
Word-Meaning: - (मरुद्भ्यः सुताः सोमाः) विद्वानों से कर्मोपासना से सिद्धि को प्राप्त हुए विद्वान् (विष्णवे अर्षन्ति) सर्वव्यापक परमात्मा के पद को प्राप्त होते हैं। जो परमात्मा (इन्द्राय) “इन्दति परमैश्वर्यं प्राप्नोतीतीन्द्रः” परमैश्वर्यसम्पन्न है तथा “वाति गच्छति सर्वत्र व्याप्नोतीति वायुः” सर्वव्यापक है। (वायवे) “व्रियते संभज्यते जनैरिति वरुणः” जो सबको भजनीय है, उसको प्राप्त होते हैं ॥३॥
Connotation: - जिन लोगों ने माता-पिता और आचार्य से सिद्धि को प्राप्त किया है, वे ज्ञान-कर्म-उपासना द्वारा ईश्वर को उपलब्ध करते हैं ॥३॥
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HARISHARAN SIDDHANTALANKAR
इन्द्र से महेन्द्र तक
Word-Meaning: - [१] (सुता:) = उत्पन्न हुए हुए सोम (इन्द्राय) = इन्द्रियों के अधिष्ठाता, बल के कर्मों को करनेवाले इन्द्र के लिये होते हैं, ये हमें इन्द्र बनाते हैं । [२] (वायवे) = [ वा गतिगन्धनयो: ] ये हमें गति के द्वारा सब बुराइयों का गन्धन [= हिंसन] करनेवाले बनाते हैं । [३] (वरुणाय) = ये हमारे से द्वेष आदि का निवारण करते हैं [निवारयति] सोम का रक्षण होने पर हमारे मनों में 'ईर्ष्या-द्वेष-क्रोध' नहीं उत्पन्न होते । [४] (मरुद्भ्यः) = [ मरुतः प्राणाः] ये हमारे जीवनों में प्राणशक्ति का वर्धन करते हैं । वस्तुतः सोम ही प्राण है। सोमरक्षण से ही प्राणशक्ति बनी रहती है। [५] ये (सोमाः) = सोमकण (विष्णवे) = उस सर्वव्यापक प्रभु के लिये (अर्षन्ति) = गतिवाले होते हैं, इनके रक्षण से अन्ततः हमें प्रभु की प्राप्ति होती है। ये हमें 'विष् व्याप्तौ' व्यापक हृदयवाला बनाते हैं यह व्यापकता ही [उदारता ही] धर्म है 'उदारं धर्ममित्याहुः '। धर्मात्मा होते हुए हम प्रभु को प्राप्त होते हैं।
Connotation: - भावार्थ- सोमकण सुरक्षित होने पर हमें 'सबल इन्द्रियोंवाला, गतिशील, निर्दोष, प्राणशक्ति- सम्पन्न व प्रभु को प्राप्त करनेवाला' बनाते हैं ।
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ARYAMUNI
Word-Meaning: - (मरुद्भ्यः सुताः सोमाः) विद्वद्भिः ज्ञानकर्मोपासना-सिद्धिगमिता विद्वांसः (विष्णवे अर्षन्ति) सर्वव्यापकस्य पदमधिगच्छन्ति यः परमात्मा (इन्द्राय) परमेश्वरः तथा (वायवे) सर्वव्यापकः (वरुणाय) सर्वेषां सेव्यश्चास्ति ॥३॥
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DR. TULSI RAM
Word-Meaning: - Knowledge, wisdom and expertise, valuable and blissful as soma, collected and refined by sages and scholars of vision and experience, flows on for Indra, the ruling soul, Vayu, the vibrant people, Varuna, powers of judgement and dispensation, Maruts, stormy warriors, and Vishnu, universal sustaining powers of life and humanity.
