घुमद्यशः, सनिं मेधां उत श्रवः
Word-Meaning: - [१] गत मन्त्र के अनुसार प्रभु स्मरण के साथ सात्त्विक संग्राम के द्वारा वासनाओं का पराजय करने पर सुरक्षित हुए हुए सोम ! तू (अस्मे) = हमारे लिये (द्युमद्यशः) = ज्योतिर्मय यश को (धेहि) = धारण कर । तेरे द्वारा हमारी ज्ञान-ज्योति बढ़े तथा हम यशस्वी कार्यों को ही करनेवाले हों। [२] (मघवद्भ्यः) = यज्ञशील पुरुषों के लिये (च) = और (मह्यम्) = मेरे लिये (सनिं मेधाम्) = धनों का उचित संविभाग करनेवाली बुद्धि को (उत) = और (श्रवः) = ज्ञान को धारण कर । सुरक्षित सोम से हमें बुद्धि व ज्ञान प्राप्त हो ।
Connotation: - भावार्थ- सुरक्षित हुआ हुआ सोम हमारे जीवन को 'ज्योतिर्मय, यशस्वी, मेधावाला तथा ज्ञान- सम्पन्न' बनाये। सुरक्षित हुआ हुआ सोम ही हमें 'त्रित' बनाता है, 'काम-क्रोध-लोभ' तीनों को तराता है यही हमारे 'शरीर, मन व बुद्धि' तीनों का विकास करता है [त्रीन् तनोति] । यह त्रित ही अगले सूक्त का ऋषि है-