उ॒भे सो॑माव॒चाक॑शन्मृ॒गो न त॒क्तो अ॑र्षसि । सीद॑न्नृ॒तस्य॒ योनि॒मा ॥
English Transliteration
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ubhe somāvacākaśan mṛgo na takto arṣasi | sīdann ṛtasya yonim ā ||
Pad Path
उ॒भे इति॑ । सो॒म॒ । अ॒व॒ऽचाक॑शत् । मृ॒गः । न । त॒क्तः । अ॒र्ष॒सि॒ । सीद॑न् । ऋ॒तस्य॑ । योनि॑म् । आ ॥ ९.३२.४
Rigveda » Mandal:9» Sukta:32» Mantra:4
| Ashtak:6» Adhyay:8» Varga:22» Mantra:4
| Mandal:9» Anuvak:2» Mantra:4
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ARYAMUNI
Word-Meaning: - (सोम) हे परमात्मन् ! (उभे अवचाकशत्) आप द्युलोक और पृथिवीलोक के साक्षी हैं (मृगः न तक्तः) और सिंह के समान प्रकृतिरूप वन में विराजमान हो रहे हैं (ऋतस्य योनिम् आसीदन्) अखिलकार्य का कारण जो प्रकृति, उसमें स्थित हो कर (अर्षसि) सर्वत्र व्याप्त हो रहे हैं ॥४॥
Connotation: - परमात्मा इस प्रकृति के कार्य चराचर ब्रह्माण्ड में ओत-प्रोत हो रहा है अर्थात् प्रकृति एक प्रकार से गहन वन है और परमात्मा सिंह के समान इस वन का स्वामी है। इस मन्त्र में परमात्मा की व्यापकता और शोर्य-क्रौर्यादि गुणों के भाव से परमात्मा की रौद्ररूपता वर्णन की है।
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HARISHARAN SIDDHANTALANKAR
शरीर व मस्तिष्क का ध्यान करना
Word-Meaning: - [१] हे (सोम) = वीर्यशक्ते ! (उभे) = दोनों द्यावापृथिवी को, मस्तिष्क व शरीर को (अवचाकशत्) = देखता हुआ दोनों का ध्यान करता हुआ तू (अर्षसि) = शरीर में गतिवाला होता है। शरीर में सुरक्षित हुआ हुआ तू (मृगः न) = जैसे आत्मान्वेषण की वृत्तिवाला होता है, उसी प्रकार (तक्तः) = [To rush upon] रोगों पर धावा बोलनेवाला होता है, रोगों पर आक्रमण करके उन्हें दूर करनेवाला होता है । [२] हे सोम ! तू (ऋतस्य योनिम्) = ऋत के उत्पत्ति स्थान प्रभु में (सीदन्) = स्थित होता हुआ (आ) = हमें प्राप्त हो । अर्थात् तू हमें प्रभु प्राप्ति के मार्ग पर, ऋत के मार्ग पर चलाता हुआ प्रभु को प्राप्त करानेवाला बन । प्रभु ऋत के उत्पत्ति-स्थान हैं। यह सोमरक्षक ऋत को अपनाता हुआ सब कार्यों को ठीक समय व ठीक स्थान पर करता हुआ प्रभु को प्राप्त होता है ।
Connotation: - भावार्थ- सुरक्षित सोम मस्तिष्क व शरीर को स्वस्थ बनाता है। यह रोगों पर आक्रमण करता है, अन्ततः हमें प्रभु को प्राप्त कराता है ।
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ARYAMUNI
Word-Meaning: - (सोम) हे परमात्मन् ! भवान् (उभे अवचाकशत्) द्युलोकपृथिवीलोकौ पश्यति (मृगः न तक्तः) सिंह इव प्रकृतिरूपे वने विराजते (ऋतस्य योनिम् आसीदन्) कार्यमात्रकारणीभूतायां प्रकृतौ स्थितः (अर्षसि) सर्वं व्याप्नोति ॥४॥
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DR. TULSI RAM
Word-Meaning: - O Soma, lord of peace and joy over-watching both heaven and earth, as a lion moves and rambles freely at will in the forest, so do you pervade and vibrate in the world of Prakrti well seated at the centre in the vedi of yajna, at the seat of human psyche and in the dynamic laws of existence.
