आदीं॑ त्रि॒तस्य॒ योष॑णो॒ हरिं॑ हिन्व॒न्त्यद्रि॑भिः । इन्दु॒मिन्द्रा॑य पी॒तये॑ ॥
English Transliteration
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ād īṁ tritasya yoṣaṇo hariṁ hinvanty adribhiḥ | indum indrāya pītaye ||
Pad Path
आत् । ई॒म् । त्रि॒तस्य॑ । योष॑णः । हरि॑म् । हि॒न्व॒न्ति॒ । अद्रि॑ऽभिः । इन्दु॑म् । इन्द्रा॑य । पी॒तये॑ ॥ ९.३२.२
Rigveda » Mandal:9» Sukta:32» Mantra:2
| Ashtak:6» Adhyay:8» Varga:22» Mantra:2
| Mandal:9» Anuvak:2» Mantra:2
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ARYAMUNI
Word-Meaning: - (त्रितस्य) जाग्रत् स्वप्न सुषुप्ति इन तीनों अवस्थाओं में अप्रतिहत प्रभाववाले भक्त पुरुष की (योषणः) शक्तियें (इन्द्राय पीतये) जीवात्मा की तृप्ति के लिये (आत् ईम्) उस पूर्वोक्त (इन्दुम्) परमैश्वर्यवाले (हरिम्) सब दुःखों के हरनेवाले परमात्मा को (अद्रिभिः) इन्द्रियवृत्तियों द्वारा (हिन्वन्ति) प्रेरित करती हैं ॥२॥
Connotation: - जो लोग परमात्मा की भक्ति में रत हैं, उनकी इन्द्रियवृत्तियें परमात्मज्ञान की उपलब्धि के लिये सदैव तत्पर रहती हैं ॥२॥
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HARISHARAN SIDDHANTALANKAR
इन्द्राय पीतये
Word-Meaning: - [१] (आत्) = अब (ईम्) = निश्चय से (त्रितस्य) = 'काम-क्रोध-लोभ' को जीतनेवाले [त्रीन् तरति ] अथवा 'शरीर, मन व बुद्धि' तीनों का विकास करनेवाले [त्रीन् तनोति] उपासक की (योषण:) = वाणियाँ ['योषा हि वाक्' श० १।४।४।४] (अद्रिभिः) = उपासनाओं के द्वारा [आदृ adore ] (इन्दुम्) = शक्ति को देनेवाले (हरिम्) = सब रोगों का हरण करनेवाले सोम को (हिन्वन्ति) = शरीर में ही प्रेरित करती है । 'ज्ञान की वाणियों द्वारा प्रभु का उपासन' हमें सोमरक्षण के योग्य बनाता है। उपासना से वृत्ति वासनामय नहीं होती। यह शुद्ध वृत्ति ही सोम का रक्षण कराती है। [२] यह सुरक्षित सोम (इन्द्राय) = उस प्रभु की प्राप्ति के लिये होता है तथा (पीतये) = रक्षा के लिये होता है । इहलोक के दृष्टिकोण से यह हमें नीरोग बनाता है तथा परलोक के दृष्टिकोण से यह हमें प्रभु प्राप्ति के मार्ग पर चलाता है ।
Connotation: - भावार्थ - ज्ञान की वाणियों द्वारा प्रभु का उपासन हमें सोम के रक्षण के योग्य बनाता है। रक्षित सोम हमें प्रभु की ओर ले चलता है और हमारा रक्षण करनेवाला होता है ।
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ARYAMUNI
Word-Meaning: - (त्रितस्य) जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तिषु अवस्थास्वप्रतिहततेजसो भक्तस्य (योषणः) शक्तयः (इन्द्राय पीतये) जीवात्मनः तृप्तये (आत् ईम्) पूर्वोक्तं (इन्दुम्) परमेश्वरं (हरिम्) सर्वदुःखापहारकं परमात्मानम् (अद्रिभिः) इन्द्रियवृत्तिभिः (हिन्वन्ति) प्रेरयन्ति ॥२॥
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DR. TULSI RAM
Word-Meaning: - And the vibrant thoughts and words of the sage beyond three fold bondage of body, mind and soul, with all perceptions of sense and conceptions of mind concentrated, rise, reach and exalt the lord of peace and joy, destroyer of suffering, for the enlightenment and ecstasy of the human soul.
