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त्वं विप्र॒स्त्वं क॒विर्मधु॒ प्र जा॒तमन्ध॑सः । मदे॑षु सर्व॒धा अ॑सि ॥

English Transliteration

tvaṁ vipras tvaṁ kavir madhu pra jātam andhasaḥ | madeṣu sarvadhā asi ||

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Pad Path

त्वम् । विप्रः॑ । त्वम् । क॒विः । मधु॑ । प्र । जा॒तम् । अन्ध॑सः । मदे॑षु । स॒र्व॒ऽधाः । अ॒सि॒ ॥ ९.१८.२

Rigveda » Mandal:9» Sukta:18» Mantra:2 | Ashtak:6» Adhyay:8» Varga:8» Mantra:2 | Mandal:9» Anuvak:1» Mantra:2


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ARYAMUNI

Word-Meaning: - हे परमात्मन् ! (त्वम् विप्रः) ‘विप्राति क्षिप्नोतीति विप्रः’ आप सबके प्रेरक हैं और (त्वम् कविः) “कवते जानाति सर्वमिति कविः” आप सर्वज्ञ हैं (मधु प्रजातम् अन्धसः) और अन्नादिकों में रस आप ही ने उत्पन्न किया है और (मदेषु) हर्षयुक्त वस्तुओं में (सर्वधाः) सब प्रकार की शोभा करानेवाले (असि) आप ही हैं ॥२॥
Connotation: - परमात्मा ने अपनी विचित्र शक्तियों से नानाविध के रस उत्पन्न किये हैं और नानाप्रकार के ऐश्वर्य उत्पन्न किये हैं। वस्तुतः परमात्मा ही सब एश्वर्यों का अधिष्ठान और सब रसों की खान है ॥२॥
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HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

'विप्र व कवि' सोम

Word-Meaning: - [१] हे सोम ! (त्वम्) = तू (विप्रः) = विशेषरूप से हमारा पूरण करनेवाला है । सोम के रक्षण के होने पर शरीर में किसी प्रकार की न्यूनता नहीं रहती । रोगकृमियों के विनाश स्थूल शरीर ठीक रहता है तो वासनाओं के विनाश से मन में किसी प्रकार की कमी नहीं आती। [२] हे सोम ! (त्वम्) = तू (कविः) = क्रान्तप्रज्ञ व ज्ञानी है । सोमरक्षण से बुद्धि तीव्र होती है, इस तीव्र बुद्धि से हमारा ज्ञान बढ़ता है। [२] (अन्धसः) = इस सोम से मधु (प्रजातम्) = जीवन में माधुर्य का विकास होता है । सोम रक्षक के जीवन में 'ईर्ष्या, द्वेष, क्रोध व चिड़चिड़ापन' आदि नहीं रहते। वस्तुतः हे सोम ! तू (मदेषु) = उल्लासों के होने पर (सर्वधाः) = सबका धारण करनेवाला (असि) = है |
Connotation: - भावार्थ - सोम [क] हमारी न्यूनताओं को दूर करता है, [ख] यह हमें ज्ञानी बनाता है, [ग] जीवन को मधुर करता है ।
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ARYAMUNI

Word-Meaning: - हे परमात्मन् ! (त्वम् विप्रः) त्वं सर्वप्रेरकः तथा (त्वम् कविः) त्वं सर्वज्ञश्च (मधु प्रजातम् अन्धसः) अन्नादिषु रसानामुत्पादकस्त्वमेव तथा च (मदेषु) हर्षजनकवस्तुषु (सर्वधाः) सर्वविधशोभानां जनकः (असि) त्वमेवासि ॥२॥
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DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - You are the vibrant sage of sages, the visionary poet of poets, and the honey sweet of all tastes born of all food. You are the sole sustainer of all in bliss divine.