मधो॒र्धारा॒मनु॑ क्षर ती॒व्रः स॒धस्थ॒मास॑दः । चारु॑ॠ॒ताय॑ पी॒तये॑ ॥
English Transliteration
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madhor dhārām anu kṣara tīvraḥ sadhastham āsadaḥ | cārur ṛtāya pītaye ||
Pad Path
मधोः॑ । धारा॑म् । अनु॑ । क्ष॒र॒ । ती॒व्रः । स॒धऽस्थ॑म् । आ । अ॒स॒दः॒ । चारुः॑ । ऋ॒ताय॑ । पी॒तये॑ ॥ ९.१७.८
Rigveda » Mandal:9» Sukta:17» Mantra:8
| Ashtak:6» Adhyay:8» Varga:7» Mantra:8
| Mandal:9» Anuvak:1» Mantra:8
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ARYAMUNI
Word-Meaning: - हे परमात्मन् ! आप हमारे इस यज्ञ में (मधोः धाराम् अनुक्षर) प्रेम की धारा बहाइये (तीव्रः) आप गतिशील हैं और (चारुः) सुन्दर हैं (ऋताय पीतये) सत्य की प्राप्ति के लिये (सधस्थम् आसदः) यज्ञ में स्थित हुए हमको स्वीकार करिये ॥८॥
Connotation: - जो लोग सत्कर्मों में स्थिर हैं और सत्कर्मों के प्रचार के लिये यज्ञादि कर्म करते हैं, उनके उत्साह को परमात्मा अवश्यमेव बढ़ाता है ॥८॥ यह सत्रहवाँ सूक्त और सातवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
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HARISHARAN SIDDHANTALANKAR
चारु सोम
Word-Meaning: - [१] हे सोम ! तू (मधो:) = मधु की (धाराम्) = धारा को (अनुक्षर) = हमारे में अनुकूलता से क्षरित करनेवाला हो । तेरे रक्षण से हमारा जीवन अतिशयेन मधुर बने। [२] (तीव्रः) = अत्यन्त तेजस्वी होता हुआ तू सधस्थम् = प्रभु के साथ सहस्थिति को (आसदः) = प्राप्त कर । प्रभु के साथ एक स्थान में हमें स्थित करनेवाला कर। [३] (चारु:) = सुन्दर जो तू है वह (ऋताय) = ऋत के लिये हो । हमारे जीवन को ऋतवाला बना । (पीतये) = तू हमारे रक्षण के लिये हो । सोम के रक्षण से जीवन अनृत से रहित होकर बड़ा सुन्दर बनता है। इस ऋत के कारण शरीर सुरक्षित रहता है ।
Connotation: - भावार्थ- सुरक्षित सोम जीवन को मधुर व ऋतवाला बनाता है। यही जीवन का रक्षक होता है। अगले सूक्त में इस सोम को 'मदेषु सर्वधा असि' इन शब्दों में स्मरण किया है-
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ARYAMUNI
Word-Meaning: - हे परमात्मन् ! भवानस्मिन्मम यज्ञे (मधोः धाराम् अनुक्षर) प्रेमधारां स्यन्दयतु (तीव्रः) यतो भवान् वेगवान् तथा (चारुः) दर्शनीयश्चास्ति (ऋताय पीतये) सत्यप्राप्तये (सधस्थम् आसदः) यज्ञस्थं मां स्वीकरोतु ॥८॥ इति सप्तदशं सूक्तं सप्तमो वर्गश्च समाप्तः ॥
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DR. TULSI RAM
Word-Meaning: - O lord of bliss and inspiration, release the showers of honey. You are intensely vibrant, bless our hall of yajna, inspire and energise the yajakas. You are glorious and gracious, give us the taste of truth and nectar of divine law beyond satiety.
