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तमु॑ त्वा वा॒जिनं॒ नरो॑ धी॒भिर्विप्रा॑ अव॒स्यव॑: । मृ॒जन्ति॑ दे॒वता॑तये ॥

English Transliteration

tam u tvā vājinaṁ naro dhībhir viprā avasyavaḥ | mṛjanti devatātaye ||

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Pad Path

तम् । ऊँ॒ इति॑ । त्वा॒ । वा॒जिन॑म् । नरः॑ । धी॒भिः । विप्राः॑ । अ॒व॒स्यवः॑ । मृ॒जन्ति॑ । दे॒वऽता॑तये ॥ ९.१७.७

Rigveda » Mandal:9» Sukta:17» Mantra:7 | Ashtak:6» Adhyay:8» Varga:7» Mantra:7 | Mandal:9» Anuvak:1» Mantra:7


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ARYAMUNI

Word-Meaning: - हे परमेश्वर ! (अवस्यवः) रक्षा चाहनेवाले (विप्राः नरः) विद्वान् लोग (देवतातये) यज्ञ के लिये (तम् उ) पूर्वोक्तगुणविशिष्ट (वाजिनम्) अन्नादि ऐश्वर्य के देनेवाले (त्वा) आपको (धीभिः) अपनी बुद्धियों से (मृजन्ति) बुद्धि की वृत्ति का विषय करते हैं ॥७॥
Connotation: - याज्ञिक लोग जब ‘यज्जाग्रतो दूरमुदैति दैवम्’ इत्यादि मन्त्रों का पाठ करते हैं, केवल पाठ ही नहीं, किन्तु उसके वाच्यार्थ पर दृष्टि देकर तत्त्व का अनुशीलन करते हैं, तब परमात्मा का साक्षात्कार होता है। इसी अभिप्राय से कहा है कि ‘धीभिः त्वामृजन्ति’ अर्थात् बुद्धि द्वारा तुम्हारा परिशीलन करते हैं ॥७॥
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HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

अवस्यवः नरः

Word-Meaning: - [१] हे सोम ! (तम्) = उस (वाजिनम्) = शक्तिशाली (त्वा) = तुझे (उ) = निश्चय से (विप्राः) = अपना पूरण करनेवाले (अवस्यवः) = रक्षण की कामनावाले (नरः) = उन्नतिपथ पर बढ़नेवाले लोग (धीभिः) = बुद्धिपूर्वक कर्मों के द्वारा मृजन्ति शुद्ध करते हैं। सोम का शोधन सदा बुद्धिपूर्वक कर्मों में लगे रहने से होता है। ऐसा करने से वासनाओं का आक्रमण नहीं होता। [२] वासनाओं के आक्रमण के न होने से यह सोम शुद्ध बना रहता है और देवतातये दिव्य गुणों के विस्तार के लिये होता है ।
Connotation: - भावार्थ- सोम का रक्षण बुद्धि पूर्वक कर्मों में लगे रहने से होता है । सोमरक्षण से दिव्य गुणों का विस्तार होता है।
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ARYAMUNI

Word-Meaning: - हे परमेश्वर ! (अवस्यवः) रक्षामिच्छवः (विप्राः नरः) विद्वांसो जनाः (देवतातये) यज्ञाय (तम् उ) पूर्वोक्तगुणसम्पन्नम् (वाजिनम्) अन्नाद्यैश्वर्यस्य दातारं (त्वा) भवन्तं (धीभिः) बुद्धिभिः (मृजन्ति) स्वज्ञानविषयं कुर्वन्ति ॥७॥
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DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - That lord of might, all victorious over cosmic dynamics, the leading lights of humanity and vibrant sages in search of peace, protection and advancement discover as pure immaculate universal presence and, by their songs and actions, glorify for attaining the bliss and blessings of divinity.