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सोमा॑ असृग्र॒मिन्द॑वः सु॒ता ऋ॒तस्य॒ साद॑ने । इन्द्रा॑य॒ मधु॑मत्तमाः ॥

English Transliteration

somā asṛgram indavaḥ sutā ṛtasya sādane | indrāya madhumattamāḥ ||

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Pad Path

सोमाः॑ । अ॒सृ॒ग्र॒म् । इन्द॑वः । सु॒ताः । ऋ॒तस्य॑ । सद॑ने । इन्द्रा॑य । मधु॑मत्ऽतमाः ॥ ९.१२.१

Rigveda » Mandal:9» Sukta:12» Mantra:1 | Ashtak:6» Adhyay:7» Varga:38» Mantra:1 | Mandal:9» Anuvak:1» Mantra:1


ARYAMUNI

Word-Meaning: - (इन्द्राय) जीवात्मा के लिये (मधुमत्तमाः) जो अत्यन्त आनन्दमय परमात्मा है (ऋतस्य) यज्ञ की (सादने) स्थिति में जो (सुताः) उपास्य समझा गया है, वह (इन्दवः) प्रकाशस्वरूप (सोमाः) सौम्यस्वभाववाला है (असृग्रम्) उसी के द्वारा यह संसार रचा गया है ॥१॥
Connotation: - जो सब प्रकार की सच्चाईयों का एकमात्र अधिकरण है और जिससे वसन्तादि यज्ञरूप ऋतुओं का परिवर्तन होता है, वही परमात्मा इस निखिल ब्रह्माण्ड का अधिपति है ॥१॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

'मधुमत्तम' सोम

Word-Meaning: - [१] (सोमाः) = शरीर में ये वीर्यकण (इन्दवः) = अत्यन्त शक्ति को देनेवाले (असृग्रं) [सृज्यन्ते ] = पैदा किये जाते हैं । (सुताः) = उत्पन्न हुए हुए ये सोमकण (ऋतस्य) = सादने ऋत के आधारभूत प्रभु की प्राप्ति के निमित्त बनते हैं। प्रभु 'ऋत के योनि' व 'ऋत के आधार' हैं । रक्षित हुआ हुआ सोम हमें दीप्त ज्ञानाग्निवाला बनाकर प्रभु-दर्शन के योग्य करता है । [२] ये सोमकण (इन्द्राय) = जितेन्द्रिय पुरुष के लिये (मधुमत्तमाः) = अतिशयेन माधुर्य को पैदा करनेवाले होते हैं । जितेन्द्रिय पुरुष ही इनका रक्षण कर पाता है । रक्षित हुए हुए ये उसके जीवन को 'शरीर, मन व बुद्धि' का स्वास्थ्य प्राप्त कराके मधुर बनाते हैं ।
Connotation: - भावार्थ- सोम [क] शक्ति को देता है, [ख] 'ऋत के आधार' प्रभु को प्राप्त कराता [ग] जीवन को स्वास्थ्य के द्वारा मधुर बनाता है। ऋषिः - असितः काश्यपो देवलो वा । देवता- पवमानः सोमः ॥ छन्दः - गायत्री ॥

ARYAMUNI

अथ उक्तपरमात्मानं यज्ञादिकर्मणः कर्तृत्वेन वर्णयति।

Word-Meaning: - (इन्द्राय) जीवात्मने (मधुमत्तमाः) यो हि आनन्दमयः (ऋतस्य) यज्ञस्य (सादने) स्थितौ (सुताः) उपास्यो यः सः (इन्दवः) प्रकाशमयः (सोमाः) सौम्यस्वभावश्चास्ति (असृग्रम्) तेनैवेदं जगत्तेने ॥१॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - Showers and streams of soma, most inspiring honey sweets of beauty and bliss of the world of divinity created in the house of the cosmic flow of existence and distilled in holy action on the yajna vedi, are created for the soul in the state of excellence.