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परि॒ प्र ध॒न्वेन्द्रा॑य सोम स्वा॒दुर्मि॒त्राय॑ पू॒ष्णे भगा॑य ॥

English Transliteration

pari pra dhanvendrāya soma svādur mitrāya pūṣṇe bhagāya ||

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Pad Path

परि॑ । प्र । ध॒न्व॒ । इन्द्रा॑य । सो॒म॒ । स्वा॒दुः । मि॒त्राय॑ । पू॒ष्णे । भगा॑य ॥ ९.१०९.१

Rigveda » Mandal:9» Sukta:109» Mantra:1 | Ashtak:7» Adhyay:5» Varga:20» Mantra:1 | Mandal:9» Anuvak:7» Mantra:1


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ARYAMUNI

अब कर्मयोगी के गुणों का वर्णन करते हैं।

Word-Meaning: - (मित्राय) मित्रतारूप गुणवाले (पूष्णे) सदुपदेश द्वारा पुष्टि करनेवाले (भगाय) ऐश्वर्य्यवाले (इन्द्राय) कर्मयोगी के लिये (सोम) हे सोम ! आप (स्वादुः) उत्तम फल के लिये (परि, प्र, धन्व) भले प्रकार प्रेरणा करें ॥१॥
Connotation: - परमात्मा उद्योगी तथा कर्मयोगियों के लिये नानाविध स्वादु फलों को उत्पन्न करता है अर्थात् सब प्रकार के ऐश्वर्य्य और धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष इन चारों फलों का भोक्ता कर्मयोगी तथा उद्योगी ही हो सकता है, अन्य नहीं, इसलिये पुरुष को कर्मयोगी तथा उद्योगी बनना चाहिये ॥१॥
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HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

मित्र- पूषा- भग

Word-Meaning: - हे सोम तू (इन्द्राय) = इस जितेन्द्रिय पुरुष के लिये (परिप्रधन्व) = शरीर रूप पात्र में चारों ओर गतिवाला हो जितेन्द्रियता के द्वारा ही वस्तुतः सोम का रक्षण होता है। यह सोम (मित्राय) = सब के प्रति स्नेह वाले इस व्यक्ति के लिये, (पूष्णे) = अपने शरीर का ठीक से पोषण करनेवाले के लिये तथा (भगाय) = प्रभु का भजन करनेवाले के लिये (स्वादुः) = जीवन को आनन्दमय बनाता है । वस्तुतः सोमरक्षण ही हमें 'मित्र- पूषा व भग' बनाता है। ऐसा बनाने पर जीवन मधुर हो जाता है। जीवन वही है जिसमें कि मेरा किसी के प्रति द्वेष नहीं, शरीर पूर्ण स्वस्थ हों तथा प्रभु भजन की मेरी वृत्ति हो ।
Connotation: - भावार्थ - जितेन्द्रियता से मैं सोम का रक्षण कर पाता हूँ। रक्षित सोम मुझे 'स्नेह वाला, स्वस्थ शरीर वाला व प्रभु भजन की वृत्ति वाला' बनाता है। इस प्रकार जीवन आनन्दमय होता है ।
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ARYAMUNI

अथ कर्मयोगिनो गुणा वर्ण्यन्ते।

Word-Meaning: - (मित्राय) मित्रतारूपगुणवते  (पूष्णे)  सदुपदेशैः पोषकाय  (भगाय) ऐश्वर्य्यसम्पन्नाय (इन्द्राय) कर्मयोगिने (सोम) हे परमात्मन् ! भवान्(स्वादुः) स्वादुफलं (परि, प्र, धन्व) प्रेरयतु ॥१॥
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DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - O Soma, come and inspire as the most delicious psychic and spiritual experience for the soul and the nation, for friends, for the sustaining guardians and for the spirit of honour and glory of humanity.