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इन्द्र॑स्य॒ हार्दि॑ सोम॒धान॒मा वि॑श समु॒द्रमि॑व॒ सिन्ध॑वः । जुष्टो॑ मि॒त्राय॒ वरु॑णाय वा॒यवे॑ दि॒वो वि॑ष्ट॒म्भ उ॑त्त॒मः ॥

English Transliteration

indrasya hārdi somadhānam ā viśa samudram iva sindhavaḥ | juṣṭo mitrāya varuṇāya vāyave divo viṣṭambha uttamaḥ ||

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Pad Path

इन्द्र॑स्य । हार्दि॑ । सो॒म॒ऽधान॑म् । आ । वि॒श॒ । स॒मु॒द्रम्ऽइ॑व । सिन्ध॑वः । जुष्टः॑ । मि॒त्राय॑ । वरु॑णाय । वा॒यवे॑ । दि॒वः । वि॒ष्ट॒म्भः । उ॒त्ऽत॒मः ॥ ९.१०८.१६

Rigveda » Mandal:9» Sukta:108» Mantra:16 | Ashtak:7» Adhyay:5» Varga:19» Mantra:6 | Mandal:9» Anuvak:7» Mantra:16


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ARYAMUNI

Word-Meaning: - हे परमात्मन् ! (इन्द्रस्य) कर्मयोगी के (हार्दि) हृदयरूप (सोमधानम्) अन्तःकरण को (आविश) प्राप्त हों, (इव) जिस प्रकार (सिन्धवः) नदियें (समुद्रम्) समुद्र को प्राप्त होती हैं, इसी प्रकार हमारी वृत्तियें आपको प्राप्त हों, आप (मित्राय) अध्यापक के लिये और (वरुणाय) उपदेशक के लिए (वायवे) ज्ञानयोगी के लिये (जुष्टः) प्रीति से युक्त और आप (दिवः) द्युलोक का (उत्तमः) सर्वोपरि (विष्टम्भः) सहारा हैं ॥१६॥
Connotation: - कोटि-कोटि ब्रह्माण्ड जिस परमात्मा के आधार पर स्थिर हैं और जो कर्मयोगी तथा ज्ञानयोगी इत्यादि योगी जनों का विद्याप्रदाता है, वही एकमात्र उपास्य देव है ॥१६॥ यह १०८ वाँ सूक्त और १९ वाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
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HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

दिवो विष्टम्भ उत्तमः

Word-Meaning: - हे सोम ! तू (इन्द्रस्य) = जितेन्द्रिय पुरुष के इस (हार्दि) = हृदयंगम, अत्यन्त सुन्दर व प्रशंसनीय (सोमधानमः) = सोम के आधारभूत शरीर कलश में आविश इस प्रकार प्रविष्ट हो, (इव) = जैसे कि (सिन्धवः) = नदियाँ (समुद्रम्) = समुद्र में प्रविष्ट होती हैं । हे सोम ! तू (मित्राय) = सबके प्रति स्नेह वाले, (वरुणाय) = निर्देषता को धारण करनेवाले, (वायवे) = निरन्तर गतिशील पुरुष के लिये (जुष्टः) = प्रेम से सेवित होता है। तू (दिवः) = मस्तिष्क रूप द्युलोक को (उत्तमः) = सर्वोत्तम (विष्टम्भः) = धारक होता है। सुरक्षित सोम इस मस्तिष्क में ज्ञानाग्नि का ईंधन बनता है ।
Connotation: - भावार्थ- सोमरक्षण के लिये 'जितेन्द्रियता 'स्नेह, निर्दोषता व क्रियाशीलता' साधन हैं। यह मस्तिष्क का सर्वोत्तम धारक है। गतमन्त्र के अनुसार मस्तिष्क के उत्तम धारक सोम का रक्षण करते हुए ये व्यक्ति 'धिष्ण्याः [धिषणायां साधुः] उत्तम बुद्धि वाले बनते हैं। इसके द्वारा 'अग्नयः ' निरन्तर आगे चलनेवाले होते हैं। ऐश्वर्य :- [ईश्वरस्य इमे ] ये प्रभु के पूरे विश्वासी आस्तिक बनते हैं । ये कहते हैं-
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ARYAMUNI

Word-Meaning: - हे परमात्मन् ! (इन्द्रस्य) कर्मयोगिनः (हार्दि) हृदयरूपम् (सोमधानम्) अन्तःकरणं (आविश) प्राप्नोतु (इव) यथा (सिन्धवः) नद्यः (समुद्रम्) समुद्रं प्राप्नुवन्ति एवं मद्वृत्तयः भवन्तं प्राप्नुवन्तु (मित्राय) अध्यापकाय (वरुणाय) उपदेशकाय च (वायवे) कर्मयोगिने (जुष्टः) प्रीतियुक्तः (दिवः) द्युलोकस्य (उत्तमः, विष्टम्भः) सर्वोपरिसहायकः ॥१६॥ इत्यष्टोत्तरशततमं सूक्तमेकोनविंशो वर्गश्च समाप्तः ॥
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DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - O Soma spirit of life divine dear to humanity, come, enter the heart core of the soul of humanity’s social order full of love and reverence for the joy and glory of life. Come, enter as rivers flow to the sea. Loved and worshipped for Mitra, spirit of friendship, for Varuna, spirit of freedom and choice with justice and vision, and for Vayu, vibrant power and dignity of the human nation, come and bless, supreme sustainer of heaven and earth.