संग्राम विजय व प्रभु वाणी श्रवण
Word-Meaning: - (वाजयुः) = हमारे साथ शक्ति को जोड़ने की कामना वाला यह सोम (कलशान् अभि) = शरीर रूप कलशों का लक्ष्य करके (असर्जि) = इस प्रकार उत्पन्न किया जाता है, (न) = जैसे कि (मीढे) = संग्राम में (सप्तिः) = घोड़ा सृष्ट किया जाता है। घोड़े के द्वारा हम संग्राम में विजय पाते हैं, इसी प्रकार इस सोम के द्वारा शरीर के अन्दर चलनेवाले रोगकृमियों के साथ संग्राम में हम विजयी होते हैं । (पुनानः) = पवित्र करता हुआ यह सोम (वाचं जनयन्) = हृदयस्थ प्रभु की वाणी को पैदा करता हुआ (असिष्यदत्) = प्रवाहित होता है। शरीर में व्याप्त सोम के द्वारा हृदय का पवित्रीकरण होकर वहाँ प्रभु की वाणी सुनाई पड़ने लगती है। यही 'वाचं जनयन्' शब्दों का भाव है।
Connotation: - भावार्थ- सोम शरीर में चलनेवाले संग्रामों में विजय प्राप्त कराने के लिये उत्पन्न किया गया है। यह हृदय को पवित्र करके हमें प्रभु की वाणी को सुनाता है।