Word-Meaning: - (यत्) = जब (त्रितस्य) =' काम-क्रोध-लोभ' को तैर जानेवाले त्रित के (पाष्योः) = पाषाणवत् दृढ़ मस्तिष्क व शरीर में और (गुहा) = हृदय रूप गुहा में (पदम्) = स्थान को (उप अभक्त) = समीप से सेवित करता है, अर्थात् शरीर में सुरक्षित हुआ हुआ सोम जब मस्तिष्क शरीर व हृदय में अपना कार्य करता है तो यह सोमधारक पुरुष (यज्ञस्य) = उस उपासनीय प्रभु के (सप्त धामभिः) = सातों 'भूः भुवः स्वः महः जनः तपः सत्यं' शब्दों से वर्णित 'स्वास्थ्य-ज्ञान- जितेन्द्रियता - हृदय की विशालता- शक्तिविकास - तप व सत्य' रूप तेजों को प्राप्त करता है और (अध) = अब (प्रियम्) = उस प्रिय प्रभु को प्राप्त करनेवाला बनता है । सोमरक्षण के लिये वासनाओं को जीतना आवश्यक है। यह सोम ही सुरक्षित होकर मस्तिष्क हृदय व शरीर को दीप्त निर्मल व सशक्त बनाता है। ऐसी स्थिति में प्रभु प्राप्ति के मार्ग पर चलता हुआ यह पुरुष सातों प्रयाणों को तैर करता हुआ प्रभु को पानेवाला बनता है । (यज्ञस्य सप्त धामभिः) = इन शब्दों में योग की सप्त भूमिकाओं का भी संकेत स्पष्ट है । इन सात भूमिकाओं को पार करके यह योगी अपने प्रिय प्रभु को पानेवाला बनता है ।
Connotation: - भावार्थ - कामादि शत्रुओं से तैरने वाला, दृढ शरीर वाला योग सातों भूमियों को पार कर साधक प्रभु को प्राप्त कर सकता है।