Word-Meaning: - हे (पवमान) = हमारे जीवनों को पवित्र करनेवाले सोम ! (य:) = जो तेरा (ओजिष्ठ:) = ओजस्वितम, हमें अधिक से अधिक शक्तिशाली बनानेवाला रस है (तम्) = उस (श्रवाय्यम्) = [श्रावसे उत्तमम्] ज्ञान- प्रापण में उत्तम, ज्ञानाग्नि के दीपन द्वारा ज्ञानवर्धक रस को (आभर) = हमारे लिये सर्वथा पुष्ट करिये । (सः) = जो रस (पञ्च-चर्षणी:) = पञ्चजनों को, पाँचों यज्ञों से युक्त जनों को (अभि) = आभिमुख्येन प्राप्त होता है यज्ञशीलता ही मनुष्य को वासनाओं से बचाकर सोमरक्षण के योग्य बनाती है । है सोम ! तू हमें उस रस को प्राप्त करा (येन) = जिससे कि (रयिम्) = सब अन्नमय आदि कोशों के ऐश्वर्यों को (वनामहै) = हम प्राप्त करें। इस सोमरस [वीर्यशक्ति] ने ही तो हमें 'तेज, वीर्य, ओजबल, मन्यु व सहस्' को प्राप्त कराता है।
Connotation: - भावार्थ- हमें वह सोम प्राप्त हो जो कि हमें 'ओजस्वी, ज्ञानी, यज्ञशील व ऐश्वर्ययुक्त' बनाता है ।