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पु॒रोजि॑ती वो॒ अन्ध॑सः सु॒ताय॑ मादयि॒त्नवे॑ । अप॒ श्वानं॑ श्नथिष्टन॒ सखा॑यो दीर्घजि॒ह्व्य॑म् ॥

English Transliteration

purojitī vo andhasaḥ sutāya mādayitnave | apa śvānaṁ śnathiṣṭana sakhāyo dīrghajihvyam ||

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Pad Path

पु॒रःऽजि॑ती । वः॒ । अन्ध॑सः । सु॒ताय॑ । मा॒द॒यि॒त्नवे॑ । अप॑ । श्वान॑म् । श्न॒थि॒ष्ट॒न॒ । सखा॑यः । दी॒र्घ॒ऽजि॒ह्व्य॑म् ॥ ९.१०१.१

Rigveda » Mandal:9» Sukta:101» Mantra:1 | Ashtak:7» Adhyay:5» Varga:1» Mantra:1 | Mandal:9» Anuvak:6» Mantra:1


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ARYAMUNI

अब परमात्मा के गुणों द्वारा उसकी उपासना कथन करते हैं।

Word-Meaning: - (सखायः) हे याज्ञिकों ! (वः) आप लोग (पुरोजिती) जो सबके विजेता हैं, (अन्धसः) सर्वप्रिय (सुताय) संस्कृत (मादयित्नवे) आह्लादक परमात्मा के स्वरूपज्ञान में (श्वानम्) जो विघ्नकारी लोग हैं, उनको (अपश्नथिष्टन) दूर करें। आप (दीर्घजिह्व्यम्) वेदरूप विशाल वाणीवाले परमात्मा की उपासना करो “जिह्वेति वाङ्नामसु पठितम्” नि. २। खं.। २३ ॥१॥
Connotation: - परमात्मा शब्दब्रह्म का एकमात्र कारण है, इसलिये मुख्यतः करके उसी को बृहस्पति वा वाचस्पति कहा जा सकता है, इसी अभिप्राय से परमात्मा के लिये बहुधा कवि शब्द आया है, इस तात्पर्य से यहाँ परमात्मा को दीर्घजिह्व्य कहा है ॥१॥
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HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

दीर्घजिह्वयम् श्वा अपश्रथन

Word-Meaning: - हे (सखायः) = मित्रो! (वः) = तुम्हारे लिये (पुर: जिती) = असुर पुरियों का विजय करनेवाले (अन्धसः) = उत्पन्न रस के लिये (दीर्घजिह्वयं) = इस दीर्घ जिह्वा वाले (श्वानम्) = स्वयं लोभ रूप कुत्ते को (अपश्रथिष्टन) = दूर हिंसित करो, स्वाद का लोभ ही यहाँ 'दीर्घजिह्वयं श्वानं' इस शब्द से कहा गया है । स्वाद के वशीभूत हो जाने पर सोम के रक्षण का सम्भव नहीं रहता। यदि स्वाद को जीतकर हम सोम के रक्षण के लिये यत्नशील होंगे तो यह रक्षित सोम हमारे लिये आसुर भावों का पराजय करनेवाला होगा। इन आसुरभावों के विनाश से हमारा जीवन उल्लासमय होगा ।
Connotation: - भावार्थ- स्वादेन्द्रिय को जीते बिना सोम के रक्षण का सम्भव नहीं होता। सुरक्षित सोम आसुरभावों का विनाशक होता है ।
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ARYAMUNI

अथ परमात्मनो गुणगुणिभावेन उपासनमुपदिश्यते।

Word-Meaning: - (सखायः) हे याज्ञिकाः ! (पुरोजिती) सर्वस्य जेता (अन्धसः) सर्वप्रियः (वः सुताय मादयित्नवे) युष्माकं संस्कृत आह्लादको यः परमात्मा तत्स्वरूपज्ञाने यः (श्वानम्) विघ्नकारी तं (अप श्नथिष्टन) निवारयत (दीर्घजिह्व्यम्) वेदमयविशालवाग्वतः परमात्मन उपासनां कुरुत यूयम् ॥१॥
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DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - O friends, for your attainment of the purified and exhilarating Soma bliss of existence, eliminate vociferous disturbances of the mind and concentrate on the deep resounding voice of divinity.