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त्वं धियं॑ मनो॒युजं॑ सृ॒जा वृ॒ष्टिं न त॑न्य॒तुः । त्वं वसू॑नि॒ पार्थि॑वा दि॒व्या च॑ सोम पुष्यसि ॥

English Transliteration

tvaṁ dhiyam manoyujaṁ sṛjā vṛṣṭiṁ na tanyatuḥ | tvaṁ vasūni pārthivā divyā ca soma puṣyasi ||

Pad Path

त्वम् । धिय॑म् । म॒नः॒ऽयुज॑म् । सृ॒ज । वृ॒ष्टिम् । न । त॒न्य॒तुः । त्वम् । वसू॑नि । पार्थि॑वा । दि॒व्या । च॒ । सो॒म॒ । पु॒ष्य॒सि॒ ॥ ९.१००.३

Rigveda » Mandal:9» Sukta:100» Mantra:3 | Ashtak:7» Adhyay:4» Varga:27» Mantra:3 | Mandal:9» Anuvak:6» Mantra:3


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ARYAMUNI

Word-Meaning: - हे परमात्मन् ! (त्वं) तुम (मनोयुजं) मन को स्थिर करनेवाले (धियं) कर्म्मयोग को (सृज) उत्पन्न करो (न) जैसे कि (तन्यतुः) मेघ (वृष्टिं) वृष्टि का विस्तार करता है, इसी प्रकार (सोम) हे सर्वोत्पादक परमात्मन् ! (त्वं) तुम (पार्थिवा) पृथिवीसम्बन्धी (च) और (दिव्या) द्युलोकसम्बन्धी (वसूनि) धनों से (पुष्यसि) हमको पुष्ट करो ॥३॥
Connotation: - कर्मयोगी पुरुष ही मन के स्थैर्य को प्राप्त करके विविध ऐश्वर्य का स्वामी बनता है ॥३॥
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HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

मनोयुजं धियम्

Word-Meaning: - हे (सोम) = वीर्य ! शरीर में सुरक्षित हुआ हुआ (त्वम्) = तू (मनोयुजम्) = मन के योग वाली (धियम्) = बुद्धि को सृज उत्पन्न कर, (न) = जैसे कि (तन्यतुः) = गर्जने वाला मेघ (वृष्टिम्) = वृष्टि को पैदा करता है। सुरक्षित सोम चित्तवृत्ति की शान्ति का कारण बनता है। इस शान्त मन से युक्त बुद्धि अपने व्यापार को उत्तमता से कर पाती है। हे सोम ! (त्वम्) = तू ही (पार्थिवा वसूनि) = इस शरीर रूप पृथिवी से सम्बद्ध शक्ति रूप वसुओं को (च) = तथा (दिव्या) = मस्तिष्क रूप द्युलोक से सम्बद्ध ज्ञानधनों को (पुष्यसि) = पुष्ट करता है।
Connotation: - भावार्थ- सुरक्षित सोम पार्थिव व दिव्य वसुओं को प्राप्त करानेवाला होता है ।
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ARYAMUNI

Word-Meaning: - हे परमात्मन् ! (त्वं) भवान् (मनोयुजं) मनःस्थापकं (धियं) कर्मयोगम् (सृज) उत्पादयतु (न) यथा (तन्यतुः) मेघः (वृष्टिं) वर्षं तनोति एवं (सोम) हे सर्वोत्पादक ! (त्वं) भवान् (पार्थिवा) पृथिवीसम्बन्धीनि (दिव्या) द्युलोकसम्बन्धीनि च (वसूनि) धनानि (पुष्यसि) मह्यं भरतु ॥३॥
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DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - O Soma, like the rain showers of the clouds, pray create, inspire and augment the vision, intelligence, understanding and will which may stabilise the mind in the state of peace and constancy. Indeed, you create and augment the wealth, honour and excellence of both earthly and heavenly order.