Word-Meaning: - [१] हे (इन्द्र) = परमैश्वर्यशालिन् प्रभो ! आप (नः) = हमें (आगधि) = प्राप्त होइये। (प्रियः) = आप प्रीति व आनन्द के जनक हैं, (सत्राजित्) = सदा विजय प्राप्त करानेवाले हैं। (अगोह्यः) = किसी से भी संवृत नहीं किये जाने योग्य हैं। सारे ब्रह्माण्ड को आपने अपने में आवृत किया हुआ है। 'अगोह्यः' का भाव यह भी है कि प्रभु की महिमा कण-कण में दृष्टिगोचर होती है, सो प्रभु का प्रकाश तो सर्वत्र है। [२] आप (गिरिः न) = उपदेष्टा के समान हैं। हृदयस्थरूपेण सदा सत्कर्मों की प्रेरणा दे रहे हैं। (विश्वतः पृथुः) = सब दृष्टिकोणों से विशाल हैं। आपका ज्ञान, बल व ऐश्वर्य सब अनन्त है। आप (दिवः पतिः) = प्रकाश के, ज्ञान के स्वामी हैं।
Connotation: - भावार्थ- प्रभु हमें विजय प्राप्त कराते हैं। ज्ञानोपदेश द्वारा वे हमारा कल्याण करते हैं।