'इन्द्र विप्र बृहत्, धर्मकृत् विपश्वित् पनस्यु'
Word-Meaning: - [१] (इन्द्राय) = परमैश्वर्यशाली प्रभु के लिये (साम गायत) = साम [स्तोत्र ] का गायन करो। (विप्राय) = ज्ञानी, (बृहते) = महान् प्रभु के लिये बृहत् खूब ही साम का गायन करो। [२] उस प्रभु के लिये गायन करो, जो (धर्मकृते) = धारणात्मक कर्मों को करनेवाले हैं। (विपश्चिते) = ज्ञानी हैं और (पनस्यवे) = स्तुति को चाहनेवाले हैं। जीव को इस स्तुति के द्वारा ही अपने लक्ष्य का स्मरण होता है। यह लक्ष्य का अविस्मरण उसकी प्रगति का साधन बनता है। इसीलिए प्रभु यह चाहते हैं, कि जीव का जीवन स्तुतिमय हो ।
Connotation: - भावार्थ- हम प्रभु का स्तवन करें। प्रभु के समान ही इन्द्र [ जितेन्द्रिय] बृहत् [वृद्धिवाले] विप्र [अपना पूरण करनेवाले] धर्मकृत् [धर्म के कार्य करनेवाले] विपश्चित् [ज्ञानी] व स्तुतिमय [पनस्यु] बनें।