सोम का स्वाध्याय व स्तवन द्वारा शरीर में स्तोभन [रोकना]
Word-Meaning: - [१] उस (मद्वने) = [मद्+वन्] हर्ष का सम्भजन करनेवाले, आनन्दस्वरूप (इन्द्राय) = परमैश्वर्यशाली प्रभु की प्राप्ति के लिये (नः गिरः) = हमारी ज्ञान की वाणियाँ (सुतं परिष्टोभन्तु) = उत्पन्न हुए हुए सोम को शरीर में ही चारों ओर रोकनेवाली हों। [ स्तोभते =stop] शरीर में सोम के सुरक्षित होने पर ही प्रभु की प्राप्ति होती है। [२] (कारवः) = क्रियाओं को कुशलता से करने के द्वारा प्रभु का अर्चन करनेवाले स्तोता (अर्कम्) = उस उपासनीय प्रभु का (अर्चन्तु) = पूजन करें। कर्त्तव्य कर्मों को करके उन्हें प्रभु के लिये अर्पित करना ही प्रभु का अर्चन है।
Connotation: - भावार्थ-उस आनन्दमय प्रभु की प्राप्ति के लिये सोम का रक्षण आवश्यक है । सोमरक्षण के लिये स्वाध्याय व प्रभु-स्तवन साधन बनते हैं।