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खे रथ॑स्य॒ खेऽन॑स॒: खे यु॒गस्य॑ शतक्रतो । अ॒पा॒लामि॑न्द्र॒ त्रिष्पू॒त्व्यकृ॑णो॒: सूर्य॑त्वचम् ॥

English Transliteration

khe rathasya khe nasaḥ khe yugasya śatakrato | apālām indra triṣ pūtvy akṛṇoḥ sūryatvacam ||

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Pad Path

खे । रथ॑स्य । खे । अन॑सः । खे । यु॒गस्य॑ । श॒त॒क्र॒तो॒ इति॑ शतऽक्रतो । अ॒पा॒लाम् । इ॒न्द्र॒ । त्रिः । पू॒त्वी । अकृ॑णोः । सूर्य॑ऽत्वचम् ॥ ८.९१.७

Rigveda » Mandal:8» Sukta:91» Mantra:7 | Ashtak:6» Adhyay:6» Varga:14» Mantra:7 | Mandal:8» Anuvak:9» Mantra:7


HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

सूर्यत्वच् बनना

Word-Meaning: - [१] (रथस्य) = शरीररूप रथ के (खे) = छिद्र में (अनस:) = [ अन प्राणने] प्राणमय कोश के, इन्द्रियों के [प्राणा: वाव इन्द्रियाणि] (खे) = छिद्र में तथा (युगस्य) = आत्मा व इन्द्रियों के मिलानेवाले मन के [मन द्वारा आत्मा का इन्द्रियों के साथ सम्पर्क होता है] (खे) = छिद्र में, हे (शतक्रतो) = अनन्त प्रज्ञान व शक्तिवाले (इन्द्र) = परमैश्वर्य सम्पन्न प्रभो ! (अपालाम्) = सब दोषों का सुदूर वारण करनेवाली को (त्रि:) = तीन बार [ शरीर, इन्द्रियों व मन से] (पूत्वी) = पवित्र करके (सूर्यत्वचम्) = सूर्य के समान त्वचावाला (अकृणो:) - तूने कर दिया।
Connotation: - भावार्थ- प्रभु अपने उपासक को शरीर, इन्द्रियों व मन में निर्दोष बनाकर दीप्त जीवनवाला बना देते हैं। यह उपासक सूर्यसम तेजस्वी प्रतीत होने लगता है। प्रभु द्वारा पवित्र किया गया यह उपासक ज्ञान को [श्रुत] अपना सुरक्षा स्थान [कक्ष] बनाता है, सो ' श्रुतकक्ष' नामवाला होता है। इस उत्तम [सु] रक्षा स्थानवाला [कक्ष] यह 'सुकक्ष' बनता है। यह सब अंगों में रसवाला 'आंगिरस' तो है ही। यह सब साथियों से इन्द्र के गायन के लिये कहता है-

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - Indra, giver of health and energy, O soul, agent of a hundred good actions, whatever the weakness of this chariot, the body system, whatever the weakness in the pranic energy system, and whatever weakness there be in the coordination of the various systems of body, prana and mind in relation to the soul, all these weaknesses of the unprotected, under nourished and immature maiden, I pray, make up and give her a radiant personality.