प्रभु का गायन वृत्रहन्तम हैं तथा ज्योति का जनक है
Word-Meaning: - [१] हे (मरुतः) = परिमित बोलनेवाले क्रियाशील स्तोताओ ! (इन्द्राय) = उस परमैश्वर्यशाली प्रभु के लिये (बृहत्) = खूब ही गायत गायन करो। यह गायन (वृत्रहन्तमम्) = वासनाओं को अधिक से अधिक विनष्ट करनेवाला होगा। [२] उस देवाय प्रकाशमय प्रभु के लिये उस स्तोत्र का गायन करो, (येन) = जिससे कि (ऋतावृधः) = ऋत का [यज्ञ का] अपने में वर्धन करनेवाले लोग (ज्योतिः) = प्रकाश के (अजनयन्) = अपने में प्रादुर्भूत करते हैं। उस ज्योति को, जो (देवम्) = उनके जीवन को द्योतित करनेवाली होती है तथा जागृवि उन्हें सतत जागरणशील बनाती है उन्हें लक्ष्य को भूलने नहीं देती। यह ज्योति उन्हें सदा सावधान रखती है और शत्रुओं से आक्रान्त नहीं होने देती ।
Connotation: - भावार्थ- हम परिमित बोलनेवाले व क्रियाशील बनकर प्रभु का स्तवन करें। यह स्तवन हमारे जीवन में ज्योति को जगाएगा और वासनान्धकार का विलय कर देगा।