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तवेदि॑न्द्रा॒हमा॒शसा॒ हस्ते॒ दात्रं॑ च॒ना द॑दे । दि॒नस्य॑ वा मघव॒न्त्सम्भृ॑तस्य वा पू॒र्धि यव॑स्य का॒शिना॑ ॥

English Transliteration

taved indrāham āśasā haste dātraṁ canā dade | dinasya vā maghavan sambhṛtasya vā pūrdhi yavasya kāśinā ||

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Pad Path

तव॑ । इत् । इ॒न्द्र॒ । अ॒हम् । आ॒ऽशसा॑ । हस्ते॑ । दात्र॑म् । च॒न । आ । द॒दे॒ । दि॒नस्य॑ । वा॒ । म॒घ॒ऽव॒न् । सम्ऽभृ॑तस्य । वा॒ । पू॒र्धि । यव॑स्य । का॒शिना॑ ॥ ८.७८.१०

Rigveda » Mandal:8» Sukta:78» Mantra:10 | Ashtak:6» Adhyay:5» Varga:32» Mantra:5 | Mandal:8» Anuvak:8» Mantra:10


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SHIV SHANKAR SHARMA

Word-Meaning: - (तुरस्य) सर्वविजेता (विधतः) विधानकर्ता (वृत्रघ्नः) निखिलविघ्नविहन्ता (सोमपाव्नः) समस्त पदार्थपाता उस परमात्मा का (उदरम्) उदर अर्थात् मन (क्रत्वः+इत्) कर्म से ही (पूर्णम्+अस्ति) पूर्ण है ॥७॥
Connotation: - परमात्मा मनुष्य के सुकर्म से ही प्रसन्न होता है, इसलिये उसकी इच्छा के अनुसार मनुष्य सन्मार्ग पर चले ॥७॥
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HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

दान व प्रभुप्राप्ति

Word-Meaning: - [१] हे (इन्द्र) = परमैश्वर्यशालिन् प्रभो ! (अहम्) = मैं (तव इत् आशसा) = आपकी ही आशा से [hoping] प्राप्ति की कामना से [desire] (हस्ते) = हाथ में (दात्रम्) = दान की क्रिया को (चनः) = निश्चय से (आददे) = ग्रहण करता हूँ। दान की वृत्ति हमारी बुराइयों का अवदान [खण्डन] करती है और इस प्रकार हमारे जीवनों को पवित्र बनाकर हमें प्रभुप्राप्ति के योग्य करती है। [२] हे (मघवन्) = ऐश्वर्यशालिन् प्रभो ! आप (संभृतस्य दिनस्य) = सम्यक् भरण किये गये (दिनस्य) = दिन के (काशिना) = [light, splendour] प्रकाश से (वा) = तथा (यवस्य) = बुराई को पृथक् करने व अच्छाई को धारण करने के प्रकाश से हमारे जीवन को (पूर्धि) = भरिये।
Connotation: - भावार्थ- हम दान की वृत्तिवाले बनकर पवित्र जीवनवाले हों। यही प्रभु प्राप्ति का मार्ग है। हमारा दिन उत्तम कार्यों से भरा हुआ हो। हम सदा बुराई को दूर करने और अच्छाई को धारण करनेवाले बनें। इसी से जीवन प्रकाशमय होगा। गतमन्त्र के अनुसार अपने प्रत्येक दिन को उत्तम कार्यों से भरनेवाला यह 'कृत्नु' है। तपस्वी होने से 'भार्गव' है। यह सोमरक्षण के द्वारा ही ऐसा बन पाता है-
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SHIV SHANKAR SHARMA

Word-Meaning: - तुरस्य=विजेतुः। विधतः=विधानकर्तुः। वृत्रघ्नः= निखिलविघ्नविहन्तुः। सोमपाव्नः=सकलपदार्थपातुः तस्य। उदरम्=मनः। क्रत्वः+इत्=कर्मणैव पूर्णमस्ति ॥७॥
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DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - Indra, by virtue of hope and aspiration centred in you, I take up the sickle in hand to reap the ripe grain for my portion. O lord of munificence and glory, fill up my hand with the day’s collection of grain and my mind with the light of day.