Word-Meaning: - [१] हे (इन्द्र) = परमैश्वर्यशालिन् प्रभो ! (अहम्) = मैं (तव इत् आशसा) = आपकी ही आशा से [hoping] प्राप्ति की कामना से [desire] (हस्ते) = हाथ में (दात्रम्) = दान की क्रिया को (चनः) = निश्चय से (आददे) = ग्रहण करता हूँ। दान की वृत्ति हमारी बुराइयों का अवदान [खण्डन] करती है और इस प्रकार हमारे जीवनों को पवित्र बनाकर हमें प्रभुप्राप्ति के योग्य करती है। [२] हे (मघवन्) = ऐश्वर्यशालिन् प्रभो ! आप (संभृतस्य दिनस्य) = सम्यक् भरण किये गये (दिनस्य) = दिन के (काशिना) = [light, splendour] प्रकाश से (वा) = तथा (यवस्य) = बुराई को पृथक् करने व अच्छाई को धारण करने के प्रकाश से हमारे जीवन को (पूर्धि) = भरिये।
Connotation: - भावार्थ- हम दान की वृत्तिवाले बनकर पवित्र जीवनवाले हों। यही प्रभु प्राप्ति का मार्ग है। हमारा दिन उत्तम कार्यों से भरा हुआ हो। हम सदा बुराई को दूर करने और अच्छाई को धारण करनेवाले बनें। इसी से जीवन प्रकाशमय होगा। गतमन्त्र के अनुसार अपने प्रत्येक दिन को उत्तम कार्यों से भरनेवाला यह 'कृत्नु' है। तपस्वी होने से 'भार्गव' है। यह सोमरक्षण के द्वारा ही ऐसा बन पाता है-