Word-Meaning: - [१] उल्लिखित प्रकार से माता प्रेरणा को प्राप्त करनेवाला यह बालक बड़ा होकर (एकया प्रतिधा) = अद्वितीय प्रतिधान से, अर्थात् इन्द्रियों को विशेषरूप से विषयों से आवृत्त [प्रत्याहृत] करने के द्वारा (इन्द्रः) = जितेन्द्रिय बनकर (सोमस्य) = सोमशक्ति के [वीर्यशक्ति के] (काणुका) = कान्त - सुन्दर (सरांसि) = प्रवाहों को (त्रिंशतम्) = शुक्लपक्ष व कृष्णपक्ष के तीसों अहोरात्रों में (साकं अपिबत्) = साथ पीनेवाला होता है-प्रभु की उपासना करता हुआ, प्रभु के सम्पर्क में रहने से वासनाओं के आक्रमण से सदा बचता हुआ अपने अन्दर पीनेवाला होता है [ Imbibe] - सोम को अपने अंग-प्रत्यंगों में ही व्याप्त करता है। [२] वस्तुतः उन्नति का मार्ग यही है कि हम दिन-रात सोम के रक्षण का ध्यान करें। सोमशक्ति के ये प्रवाह ही हमारे अंग-प्रत्यंगों को सुन्दर शक्ति प्राप्त करानेवाले हैं।
Connotation: - भावार्थ- सोमरक्षण के लिये अत्यन्त अधिक प्रत्याहार [प्रतिधान] की आवश्यकता है। एक युवक को सदा इस बात का ध्यान हो -तीसों अहोरात्रों में वह इसके रक्षण के लिये यत्नशील हो ।