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वा॒वृ॒धा॒नो म॒रुत्स॒खेन्द्रो॒ वि वृ॒त्रमै॑रयत् । सृ॒जन्त्स॑मु॒द्रिया॑ अ॒पः ॥
English Transliteration
Mantra Audio
vāvṛdhāno marutsakhendro vi vṛtram airayat | sṛjan samudriyā apaḥ ||
Pad Path
व॒वृ॒धा॒नः । म॒रुत्ऽस॑खा । इन्द्रः॑ । वि । वृ॒त्रम् । ऐ॒र॒य॒त् । सृ॒जन् । स॒मु॒द्रियाः॑ । अ॒पः ॥ ८.७६.३
Rigveda » Mandal:8» Sukta:76» Mantra:3
| Ashtak:6» Adhyay:5» Varga:27» Mantra:3
| Mandal:8» Anuvak:8» Mantra:3
SHIV SHANKAR SHARMA
Word-Meaning: - (अग्ने) हे सर्वशक्ते ! (यथा) जैसे (पितुः) पिता का पालन पुत्र जानता है, वैसे (वयं) हम लोग (पुरा) बहुत दिनों से (ते) तुम्हारा (अवसः) रक्षण और साहाय्य (विद्म) जानते हैं, (अध) इस कारण (ते) तुमसे (सुम्नं) सुख की (ईमहे) याचना करते हैं ॥१६॥
Connotation: - हे ईश ! जिस हेतु आपका सहाय बहुत दिनों से हम लोग जानते हैं, इस हेतु आपसे उसकी अपेक्षा करते हैं ॥१६॥
HARISHARAN SIDDHANTALANKAR
वृत्रं वि ऐरयत्
Word-Meaning: - [१] (मरुत्सखा) = प्राण हैं सखा जिसके, वह (इन्द्रः) = जितेन्द्रिय पुरुष (वावृधाना) = 'शरीर, मन व बुद्धि' के दृष्टिकोण से अत्यन्त वृद्धि को प्राप्त होता हुआ (वृत्रम्) = वासना को (वि ऐरयत्) = विशेषरूप से कम्पित करके विनष्ट करता है। [२] यह (समुद्रियाः) = [स+मुद्] उस आनन्दमय प्रभु की ओर ले- जानेवाले (अपः) = कर्मों को (सृजन्) = उत्पन्न करता हुआ होता है। सदा उत्तम कर्मों को करता हुआ, इन कर्मों के द्वारा प्रभु का अर्चन करता है। 'अप' का अर्थ 'रेतःकण' भी है। उन रेतःकणों को उत्पन्न करता है, जो इसे प्रभु प्राप्ति में सहायक होते हैं। इनके रक्षण से तीव्रबुद्धि होकर वह प्रभु का दर्शन करता है।
Connotation: - भावार्थ- प्राणसाधना द्वारा जितेन्द्रिय पुरुष वासना का विनाश करता है और रेतःकणों का रक्षण करता हुआ प्रभु की ओर बढ़ता है।
SHIV SHANKAR SHARMA
Word-Meaning: - हे अग्ने ! यथा पितुः पालनं पुत्रो जानाति तथा वयमपि। पुरा=बहुकालात्। ते=तव। अवसः=रक्षणम्। विद्म। अव। तस्मात्। ते। सुम्नं=सुखम्। ईमहे=याचामहे ॥१६॥
DR. TULSI RAM
Word-Meaning: - Growing in strength, Indra, the divine soul, friend of winds and cosmic energies of universal prana, scatters the clouds of darkness there by releasing the streams of waters from the sky, and the streams of ananda from the heart.
