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स॒बाधो॒ यं जना॑ इ॒मे॒३॒॑ऽग्निं ह॒व्येभि॒रीळ॑ते । जुह्वा॑नासो य॒तस्रु॑चः ॥
English Transliteration
Mantra Audio
sabādho yaṁ janā ime gniṁ havyebhir īḻate | juhvānāso yatasrucaḥ ||
Pad Path
स॒ऽबाधः॑ । यम् । जनाः॑ । इ॒मे । अ॒ग्निम् । ह॒व्येभिः॑ । ईळ॑ते । जुह्वा॑नासः । य॒तऽस्रु॑चः ॥ ८.७४.६
Rigveda » Mandal:8» Sukta:74» Mantra:6
| Ashtak:6» Adhyay:5» Varga:22» Mantra:1
| Mandal:8» Anuvak:8» Mantra:6
SHIV SHANKAR SHARMA
Word-Meaning: - हे मनुष्यों ! (पन्यांसम्) स्तवनीय और (जातवेदसम्) जिससे समस्त विद्याएँ और सम्पत्तियाँ उत्पन्न हुई हैं, उस देव की प्रार्थना करो। (यः) महेश्वर (देवताति) सम्पूर्ण पदार्थपोषक (दिवि) जगत् में (उद्यता) उद्योगवर्धक और आन्तरिक बलप्रद (हव्यानि) हव्यवत् उपयोगी और सुमधुर पदार्थों को (ऐरयत्) दिया करता है, अतः वही देव सर्वपूज्य है ॥३॥
Connotation: - दिवि=यह सम्पूर्ण जगत् दिव्य सुरम्य और आनन्दप्रद है। उद्यत्=इसमें जितने पदार्थ हैं, वे उद्योग की शिक्षा दे रहे हैं। परन्तु हम मनुष्य अज्ञानवश इसको दुःखमय बनाते हैं। अतः जिससे सर्व ज्ञान की उत्पत्ति हुई है, उसकी उपासना करो, जिससे सुमति प्राप्त हो ॥३॥
HARISHARAN SIDDHANTALANKAR
जुह्वानासः यतस्रुचः
Word-Meaning: - [१] हम उस (अग्निं) = अग्रणी प्रभु को प्राप्त करते हैं, (यं) = जिनको (ये) = ये (सबाधः) = काम, क्रोध आदि शत्रुओं के बाधन के साथ रहनेवाले (जनाः) = लोग (हव्येभिः) = दानपूर्वक अदन के द्वारा (इडते) = उपासित करते हैं। प्रभु की उपासना करनेवाला [क] काम आदि शत्रुओं को जीतने का प्रयत्न करता है। [ख] और सदा दानपूर्वक यज्ञशेष का ही सेवन करता है। [२] ये प्रभु के उपासक (जुह्वानास:) = सदा यज्ञशील होते हैं और (यतस्त्रुचः) = नियमित वाणीवाले होते हैं। वाणी को वश में रखते हुए सदा शुभशब्दों का ही प्रयोग करते हैं।
Connotation: - भावार्थ-उपासक [१] काम आदि को जीतता है, [२] यज्ञशेष का सेवन करता है, [३] सदा यज्ञशील होता है, [४] वाणी को वश में रखता है।
SHIV SHANKAR SHARMA
Word-Meaning: - हे मनुष्याः ! पन्यांसम्=पननीयं स्तवनीयम्। जातवेदसम्=ज्ञानोत्पत्तिसाधनमीशं प्रार्थयध्वम्। यः। देवताति=देवानां सर्वेषां पदार्थानां भरणपोषणादिकं यत्र तायते। सा देवतातिः। तस्यां दिवि जगति। उद्यता=उद्योगवर्धकानि। हव्यानि=हव्यवद् सुमधुराणि भोज्यानि। ऐरयत्=प्रेरयति ॥३॥
DR. TULSI RAM
Word-Meaning: - Let us adore Agni whom all the yajnic people, in spite of limitations, eagerly invoke and serve with ladlefuls of havi.
