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पन्यां॑सं जा॒तवे॑दसं॒ यो दे॒वता॒त्युद्य॑ता । ह॒व्यान्यैर॑यद्दि॒वि ॥

English Transliteration

panyāṁsaṁ jātavedasaṁ yo devatāty udyatā | havyāny airayad divi ||

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Pad Path

पन्या॑सम् । जा॒तऽवे॑दसम् । यः । दे॒वऽता॑ति । उत्ऽय॑ता । ह॒व्यानि॑ । ऐर॑यत् । दि॒वि ॥ ८.७४.३

Rigveda » Mandal:8» Sukta:74» Mantra:3 | Ashtak:6» Adhyay:5» Varga:21» Mantra:3 | Mandal:8» Anuvak:8» Mantra:3


SHIV SHANKAR SHARMA

Word-Meaning: - हे मनुष्यवर्ग ! केवल नृपों के ऊपर सर्व भार मत दो, किन्तु स्वयमपि उद्योग करो, इससे यह शिक्षा देते हैं। यथा (धृष्णो) धर्षक हे वीर मनुष्यसमुदाय ! तू जब-जब (कृष्णया) कृष्णवर्ण पापिष्ठ (विशा) प्रजा से (बाधितः) पीड़ित होओ, तब-तब (पुरम्+न) दुष्ट नगर के समान उस पापिष्ठ प्रजा को (आरुज) विनष्ट कर। अन्ति० ॥१८॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

दिवि ऐरयत्

Word-Meaning: - [१] उस (पन्यांसं) = स्तुत्य (जातवेदसं) = सर्वज्ञ व सर्वैश्वर्य युक्त प्रभु का [ प्रशंसन्ति], शंसन करते हैं (यः) = जो हमारे जीवनों में (उद्यता) = उद्यम से प्राप्त (हव्यानि) = हव्य पदार्थों को (देवताति) = यज्ञों में (ऐरयत्) = प्रेरित कराता है और इसप्रकार हमें (दिवि) = ज्ञान में प्रेरित करता है। [२] प्रभु अपने उपासक को श्रम से उत्तम पदार्थों को अर्जित करने के लिए शिक्षित करते हैं। उन पदार्थों को यज्ञों में विनियुक्त कराते हैं और इस प्रकार हमें ज्ञान में उपस्थित करते हैं।
Connotation: - भावार्थ- हम श्रम से धनार्जन करते हुए यज्ञशील बनें और ज्ञान में अवस्थित हों।

SHIV SHANKAR SHARMA

Word-Meaning: - हे मनुष्यवर्ग ! केवलं नृपेष्वेव सर्वं भारं मा क्षैप्सीः स्वयमपि प्रयतस्वेति शिक्षते। हे धृष्णो=धर्षक वीरमनुष्यसमुदाय ! त्वम्। कृष्णया=कृष्णवर्णया=पापिष्ठया। विशा=प्रजया। बाधितः=पीडितः सन् स्वयमेव। पुरन्न=दुष्टपुरमिव। आरुज प्रजां विनाशय। अन्ति० ॥१८॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - Serve and exalt the adorable Agni, all pervasive, who rises, strengthens all divinities of nature and humanity and raises the oblations to the heavens and heightens their vitality and power.