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अ॒हं हु॑वा॒न आ॒र्क्षे श्रु॒तर्व॑णि मद॒च्युति॑ । शर्धां॑सीव स्तुका॒विनां॑ मृ॒क्षा शी॒र्षा च॑तु॒र्णाम् ॥

English Transliteration

ahaṁ huvāna ārkṣe śrutarvaṇi madacyuti | śardhāṁsīva stukāvinām mṛkṣā śīrṣā caturṇām ||

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Pad Path

अ॒हम् । हु॒वा॒नः । आ॒र्क्षे । श्रु॒तर्व॑णि । म॒द॒ऽच्युति॑ । शर्धां॑सिऽइव । स्तु॒का॒ऽविना॑म् । मृ॒क्षा । शी॒र्षा । च॒तु॒र्णाम् ॥ ८.७४.१३

Rigveda » Mandal:8» Sukta:74» Mantra:13 | Ashtak:6» Adhyay:5» Varga:23» Mantra:3 | Mandal:8» Anuvak:8» Mantra:13


SHIV SHANKAR SHARMA

Word-Meaning: - हे मनुष्यों ! जो (सत्पतिम्) सज्जनों का पालक (त्वेषम्) तेजःस्वरूप (रथप्रां) संसार को विविध सुखों से पूर्ण करनेवाला (गाम्) गमनीय गानीय (अश्वमित्) और जो सर्वव्यापक ही है, उस (इन्द्रं+न) परमात्मा को गाओ, (यस्य+श्रवांसि) जिसके यश सर्वत्र फैले हुए हैं। (कृष्टयः) हे मनुष्यों ! (पन्यम्पन्यं च) उस परम प्रार्थनीय का (तूर्वथः) कीर्तिगान करो ॥१०॥
Connotation: - हे मनुष्यों ! जिसकी कीर्ति सर्वत्र व्याप्त है, उसका गान करो, और का नहीं ॥१०॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

आर्क्ष - श्रुतर्वा मदच्युत्

Word-Meaning: - [१] प्रभु कहते हैं कि (अहं) = मैं (आर्क्षे) = गतिशील पुरुष में, (श्रुतर्वणि) = ज्ञान के प्रति चलनेवाले व्यक्ति में तथा (मदच्युति) = अभिमान को छोड़नेवाले पुरुष में (हुवान:) = हूयमान होता हुआ - इनसे आराधित होता हुआ - (चतुर्णाम्) = 'काम-क्रोध-लोभ-मोह' इन चारों के (शीर्षा) = सिरों का (मृक्षा) = सफाया कर डालता हूँ। इन काम आदि चारों को ही समाप्त कर डालता हूँ। [२] मैं इसप्रकार इन्हें नष्ट कर देता हूँ, (इव) = जैसेकि (स्तुकाविनां) = वृषभों के [बैलों के] शर्धांसि बलों को कोई समाप्त कर देता है।
Connotation: - भावार्थ - प्रभु का सच्चा उपासक 'गतिशील, ज्ञानप्रिय व निरभिमान' होता है। प्रभु इसके 'काम-क्रोध-लोभ-मोह' को समाप्त कर देते हैं।

SHIV SHANKAR SHARMA

Word-Meaning: - हे मनुष्याः ! सत्पतिम्=सतां पालकम्। त्वेषम्= तेजःस्वरूपम्। रथप्रां=रथस्य संसारस्य धनादिभिः पूरयितारम्। गाम्=गमनीयम्। अश्वमित्=सर्वव्यापकमेव। इन्द्रं+न=परमात्मानं तु गायत। यस्य+श्रवांसि=सर्वत्र विततानि। हे कृष्टयः=मनुष्याः ! पन्यम्पन्यं=स्तुत्यं स्तुत्यम्। तूर्वथ=गायत। अत्र तूर्वतिर्गानार्थः ॥१०॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - For the good of people in general, for the learned, and for the joy of soma against the intoxication of pride, I invoke Agni as well as the light and powers of divinity to come and sanctify the heart and head of all the four classes of initiated people of the sacred hair.