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उ॒तो न्व॑स्य॒ यन्म॒हदश्वा॑व॒द्योज॑नं बृ॒हद् । दा॒मा रथ॑स्य॒ ददृ॑शे ॥

English Transliteration

uto nv asya yan mahad aśvāvad yojanam bṛhad | dāmā rathasya dadṛśe ||

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Pad Path

उ॒तो इति॑ । नु । अ॒स्य॒ । यत् । म॒हत् । अश्व॑ऽवत् । योज॑नम् । बृ॒हत् । दा॒मा । रथ॑स्य । ददृ॑शे ॥ ८.७२.६

Rigveda » Mandal:8» Sukta:72» Mantra:6 | Ashtak:6» Adhyay:5» Varga:15» Mantra:1 | Mandal:8» Anuvak:8» Mantra:6


SHIV SHANKAR SHARMA

ईश्वर का ग्रहण कैसे होता है, यह दिखलाते हैं।

Word-Meaning: - (रुद्रम्) सर्वदुःखनिवारक (तम्) उस ईश को (परः+मनीषया) अतिशयिता बुद्धि के द्वारा (जने+अन्तः) प्राणियों के मध्य देखने और अन्वेषण करने की (इच्छन्ति) इच्छा करते हैं और (ससम्) सर्वत्र प्रसिद्ध उसको (जिह्वया) जिह्वा से−स्तुतियों से (गृभ्णन्ति) ग्रहण करते हैं ॥३॥
Connotation: - यज्ञ में जिसकी स्तुति प्रार्थना होती है, वह कहाँ है, इस शङ्का पर कहते हैं कि प्राणियों के मध्य में ही उसको खोजो और स्तुति द्वारा उसको ग्रहण करो ॥३॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

बृहत् योजनम्

Word-Meaning: - [१] (उत) = और (उ) = निश्चय से (नु) = अब (अस्य) = इस स्तोता का (यत्) = जो (महत्) = अत्यन्त महत्त्वपूर्ण (अश्वावत्) = प्रशस्त इन्द्रियाश्वोंवाला (बृहत् योजनम्) = वृद्धि का कारणभूत योजन है- शरीररथ में इन्द्रियाश्वों का जोतना है वह (ददृशे) = दिखता है। [२] यह योजन (रथस्य) = शरीररथ का (दामा) =एक महान् बन्धन है। यह बन्धन ही इस रथ को विषयों के पत्थरों से टकराकर टूटने से बचाता है।
Connotation: - भावार्थ-स्तोता इन्द्रियाश्वों को शरीररथ में इस प्रकार जोतता है कि यह रथ आगे और आगे बढ़ता चलता है और विषयों से टकराकर चूर-चूर नहीं हो जाता।

SHIV SHANKAR SHARMA

ईश्वरः कथं गृह्यत इति दर्शयति।

Word-Meaning: - रुद्रं=सर्वदुःखनिवारकम्। तमीशम्। परः=अतिशयितया। मनीषया=बुद्ध्या। जने=जनानां=जातानाम्। अन्तर्मध्ये द्रष्टुम्। इच्छन्ति। तथा। तं+ससम्=सर्वत्र प्रसिद्धम्। जिह्वया=रसनया=स्तुत्या। गृभ्णन्ति=गृह्णन्ति ॥३॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - And as its mighty boundless expansion grows on, intensely bright with sun-rays, its sphere of energy is seen like the halo of glorious light round the solar chariot.