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ह॒विष्कृ॑णुध्व॒मा ग॑मदध्व॒र्युर्व॑नते॒ पुन॑: । वि॒द्वाँ अ॑स्य प्र॒शास॑नम् ॥

English Transliteration

haviṣ kṛṇudhvam ā gamad adhvaryur vanate punaḥ | vidvām̐ asya praśāsanam ||

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Pad Path

ह॒विः । कृ॒णु॒ध्व॒म् । आ । ग॒म॒त् । अ॒ध्व॒र्युः । व॒न॒ते॒ । पुन॒रिति॑ । वि॒द्वान् । अ॒स्य॒ । प्र॒ऽशास॑नम् ॥ ८.७२.१

Rigveda » Mandal:8» Sukta:72» Mantra:1 | Ashtak:6» Adhyay:5» Varga:14» Mantra:1 | Mandal:8» Anuvak:8» Mantra:1


SHIV SHANKAR SHARMA

Word-Meaning: - (यः) जो अग्निवाच्येश्वर (वार्य्याणाम्) सर्वश्रेष्ठ धनों का (ईशे) सर्वाधिकारी है, (अग्निः) वह अग्नि (सख्ये) जिस हेतु वह सबका मित्र पालक है, अतः (नः) हम लोगों को (इषाम्+ददातु) सर्व प्रकार के सुखों को देवे। (तोके) पुत्र (तनये) पौत्र आदिकों के लिये (शश्वत्) सदा (अग्निम्+ईमहे) ईश्वर से सुख-सम्पत्ति की याचना करते हैं, जो ईश (वसुम्) सबको बसानेवाला (सन्तम्) सर्वत्र विद्यमान और (तनूपाम्) शरीररक्षक है ॥१३॥
Connotation: - वह ईश सबका सखा और पोषक है, अतः सर्व वस्तु के लिये उससे प्रार्थना करें ॥१३॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

अध्वर्यु

Word-Meaning: - [१] हे मनुष्यो ! (हविः कृणुध्वम्) = हवि को सम्पादित करो - जीवन में त्यागपूर्वक अदन वाले बनो। [हु दानादनयोः] । प्रभु का वास्तविक पूजन इस हवि के द्वारा ही होता है। 'कस्मै देवाय हविषा विधेम '। हवि के होने पर ही (आगमत्) = वे प्रभु आते हैं। प्रभु की प्राप्ति यज्ञशील व्यक्ति को ही होती है। [२] (पुनः) = फिर (अध्वर्युः) = यज्ञशील व्यक्ति (अस्य) = इस प्रभु की (प्रशासनं) = आज्ञा को (विद्वान्) = जानता हुआ (वनते) = यज्ञ का संभजन करता है-यज्ञों को करता हुआ ही हो तो वह प्रभु का उपासन कर पाता है 'यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवाः '।
Connotation: - भावार्थ- हम हवि के द्वारा प्रभु का उपासन करें।

SHIV SHANKAR SHARMA

Word-Meaning: - योऽग्निवाच्येश्वरः। वार्य्याणां=निखिलधनानाम्। ईशे=ईषे= स्वामी भवति सोऽग्निः। सख्ये=सर्वेषां स सखास्तीति हेतौ। इषामिषोऽन्नानि। नोऽस्मभ्यं ददतु। तथा। तोके=पुत्रे। तनये=पौत्रे च। अग्निं+शश्वत्=सर्वदा सुखम्। ईमहे=याचामहे। कीदृशम्। वसुं=वासकम्। सन्तम्=सदा वर्तमानम्। तनूपाम्=शरीररक्षकम् ॥१३॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - Come, devotees of yajna, celebrants of Agni: Prepare the havi for oblation, let the high priest come, he knows the ministration of this yajna, let him serve Agni again.