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तं वो॑ म॒हो म॒हाय्य॒मिन्द्रं॑ दा॒नाय॑ स॒क्षणि॑म् । यो गा॒धेषु॒ य आर॑णेषु॒ हव्यो॒ वाजे॒ष्वस्ति॒ हव्य॑: ॥

English Transliteration

taṁ vo maho mahāyyam indraṁ dānāya sakṣaṇim | yo gādheṣu ya āraṇeṣu havyo vājeṣv asti havyaḥ ||

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Pad Path

तम् । वः॒ । म॒हः । म॒हाय्य॑म् । इन्द्र॑म् । दा॒नाय॑ । स॒क्षणि॑म् । यः । गा॒धेषु॑ । यः । आ॒ऽअर॑णेषु । हव्यः॑ । वाजे॑षु । अस्ति॑ । हव्यः॑ ॥ ८.७०.८

Rigveda » Mandal:8» Sukta:70» Mantra:8 | Ashtak:6» Adhyay:5» Varga:9» Mantra:3 | Mandal:8» Anuvak:8» Mantra:8


SHIV SHANKAR SHARMA

परमात्मा का अपरिमेयत्व दिखलाते हैं।

Word-Meaning: - (इन्द्र) हे परमैश्वर्य्यशाली देव ! (यद्) यदि एतत्सदृश (शतम्+द्यावः) शतशः द्युलोक (स्युः) हों (उत) और (भूमीः) शतशः पृथिवी हों, तथापि (ते) तेरा परिमाण इन दोनों से नहीं हो सकता। (वज्रिन्) हे दण्डधर ! (सहस्रम्+सूर्य्याः) एक सहस्र सूर्य्य भी (त्वा+न) तुझको व्याप्त नहीं कर सकते। हे भगवन् ! किंबहुना, कोई भी वस्तु (जातम्) सर्वत्र व्याप्त तुझको (न+अन्वष्ट) व्याप्त नहीं कर सकती। (रोदसी) यह सम्पूर्ण द्युलोक और पृथिव्यादिलोक मिलकर भी तुझको व्याप नहीं सकता, क्योंकि पृथिवी, अन्तरिक्ष और द्युलोक और सम्मिलित सब लोकों से तू बड़ा है ॥५॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

'गाधेषु आ-रणेषु वाजेषु' हव्यः

Word-Meaning: - [१] (तं) = उस (वः महः) = तुम्हारे तेज [महस् - Power or Lustre ] व दीप्तिरूप उस प्रभु का परिचरण करो। वे प्रभु ही तुम्हें तेजस्विता व दीप्ति प्राप्त करानेवाले हैं। (महाय्यं इन्द्र) = उस पूजनीय - शत्रुविद्रावक प्रभु को ही पूजो । (दानाय) = शत्रुओं के खण्डन के लिए (सक्षणिम्) = उपासकों के साथ समवेत होनेवाले प्रभु को पूजो। [२] (यः) = जो प्रभु (गाधेषु) = [ गाधृ प्रतिष्ठायाम्] प्रतिष्ठा को प्राप्त करानेवाले कार्यों में (हव्यः) = पुकारने योग्य हैं। प्रभु ही तो उन कार्यों को निर्विघ्नता से पूर्ण करेंगे। (यः) = जो प्रभु (आ-रणेषु) = समन्तात् आनन्दमय रमणीय कार्यों में भी पुकारने योग्य हैं। वे प्रभु ही (वाजेषु) = संग्रामों में (हव्यः) = पुकारने योग्य अस्ति हैं। प्रभु ने ही हमें उन संग्रामों में विजय प्राप्त करानी हैं।
Connotation: - भावार्थ- प्रभु का पूजन करेंगे तो प्रभु की शक्ति से हम शक्तिसम्पन्न बनेंगे। तभी हम उत्तम कार्यों को करके प्रतिष्ठा को प्राप्त करेंगे। तभी उत्तम कार्यों को प्राप्त करके आनन्दित होंगे। तभी संग्रामों में विजयी होंगे।

SHIV SHANKAR SHARMA

परमात्मनोऽपरिमेयत्वं दर्शयति।

Word-Meaning: - हे इन्द्र=परमैश्वर्य्य ! यद्=यदि। एतत्सदृश्यः। शतम्=बहवः। द्यावः=द्युलोकाः। उत=अपि च। भूमीः=भूमयः। स्युः। तथापि। ते=तव ताभ्यां परिमाणं भवितुं नार्हति। हे वज्रिन् ! सहस्रं सूर्य्या अपि त्वा=त्वाम्। नाश्नुवन्ति। जातं=सर्वत्र व्याप्तम्। त्वां=किञ्चन नाष्ट=किमपि न व्याप्नोति किंबहुना। इमे रोदसी=द्यावापृथिव्यौ। नाश्नुवाते त्वाम्। सर्वेभ्योऽतिरिच्यस इत्यर्थः। ज्यायान् पृथिव्या ज्यायानन्तरिक्षाद् ज्यायान् दिवो ज्यायानेभ्यो लोकेभ्यः ॥५॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - Invoke that great, adorable and friendly Indra for the gift of power, energy and expertise for your progress who is invoked and adored in the depth of the seas, over lands and mountains and in the battles of the brave for new heights.