Word-Meaning: - [१] (मघवा) = ऐश्वर्यशाली, (शौरदेव्यः) = [ शूरश्च असौ देवश्च, स्वार्थे ष्यञ् ] शत्रुओं को शीर्ण करनेवाला, प्रकाशमय प्रभु (नः) = हमें (कर्णगृह्या) = कानों से पकड़कर (त्रिभ्य आनयत्) = ' ज्ञान, कर्म व उपासना' इन तीनों के लिए प्राप्त कराता है। उचित दण्ड देता हुआ वह प्रभु हमें ठीक मार्ग से चलाकर मस्तिष्क में ज्ञानसम्पन्न, हाथों में यज्ञादि कर्मोंवाला तथा हृदय में उपासनावाला बनाता है । [२] प्रभु हमें इन तीनों के लिए इस प्रकार प्राप्त करता हैं (न) = जैसे (सूरिः) = एक समझदार व्यक्ति (धातवे) = दूध पीने के लिए (वत्सं) = मेमने को [बच्चे को] (अजां) = बकरी को प्राप्त कराता है। उस विद्वान् को वत्स से वैर नहीं होता। इसी प्रकार प्रभु भी हमें हित की भावना से ही कानों में पकड़कर 'ज्ञान' आदि की ओर ले चलते हैं।
Connotation: - भावार्थ- प्रभु मघवा हैं, शौरदेव्य हैं। वे हमें कानों से पकड़कर 'ज्ञान, कर्म व उपासना' की ओर ले चलते हैं। ज्ञान, कर्म व उपासना में चलता हुआ यह 'सुदीति' उत्तम दीप्तिवाला बनता है [दी-to shine] यह सबके लिए सुखों का सेचन करनेवाला 'पुरुमीढ' होता है। यह प्रार्थना करता है कि-