उदु॑ स्वा॒नेभि॑रीरत॒ उद्रथै॒रुदु॑ वा॒युभि॑: । उत्स्तोमै॒: पृश्नि॑मातरः ॥
ud u svānebhir īrata ud rathair ud u vāyubhiḥ | ut stomaiḥ pṛśnimātaraḥ ||
उत् । ऊँ॒ इति॑ । स्व॒नेभिः॑ । ई॒र॒ते॒ । उत् । रथैः॑ । उत् । ऊँ॒ इति॑ । वा॒युऽभिः॑ । उत् । स्तोमैः॑ । पृश्नि॑ऽमातरः ॥ ८.७.१७
SHIV SHANKAR SHARMA
प्राणायाम की दशा दिखलाते हैं।
ARYAMUNI
HARISHARAN SIDDHANTALANKAR
(१) (पृश्निमातर:) = प्राणसाधना के द्वारा ज्ञानरश्मियों का अपने अन्दर निर्माण करनेवाले लोग (स्वानेभिः) = इन ज्ञान की वाणियों के उच्चारण के द्वारा (उ) = निश्चय से (उदीरते) = उन्नत होते हैं। ये साधक (रथैः) = इन शरीर रथों से भी (उद्) = ऊपर उठते हैं। इनका ठीक प्रयोग करते हुए जीवन में उन्नत होते हैं। (२) (उ) = और ये साधक (वायुभिः) = (वा गतौ) इन गतिशील इन्द्रियाश्वों के द्वारा (उत्) = ये उन्नत होते हैं, वायुसम वेगवाले इन्द्रियाश्व इन्हें आगे और आगे ले चलते हैं। (स्तोमैः) = प्रभु के स्तोत्रों के द्वारा (उत्) = ये उन्नत होते हैं। वस्तुतः प्रभु का स्तवन करते हुए ही ये सब कार्यों को करते हैं। इनके शरीररथ ज्ञान की वाणियों से जुड़े हुए हैं, तो इनकी इन्द्रियों से होनेवाले सब कर्म प्रभु-स्तवनों से।
SHIV SHANKAR SHARMA
प्राणायामदशां दर्शयति।
