Word-Meaning: - [१] (ये) = जो (द्रप्साः इव) = जल-बिन्दुओं के समान (वृष्टिभिः) = शक्तियों के सेचन के द्वारा [जैसे जल - बिन्दु भूमि को सिक्त करते हैं, इसी प्रकार ये रेतःकण [द्रप्स] शक्ति का सेचन करते हैं] (रोदसी)= द्यावापृथिवी को, मस्तिष्क व शरीर को (अनु धमन्ति) = अनुकूलता से शब्दयुक्त करते हैं अथवा अनुकूलता से निर्मित करते हैं [cast - ढालना]। शरीर में ये रेतःकण शक्ति का निर्माण करते हैं और मस्तिष्क में इनके द्वारा ही ज्ञान का सञ्चार किया जाता है। [२] ये द्रप्स ही, ये शक्तिकण ही (अक्षितम्) = कभी क्षीण न होनेवाले (उत्सम्) = ज्ञान के स्रोत को (दुहन्तः) = हमारे अन्दर पूरित करते हैं। ज्ञानाग्नि का ईंधन ये ही बनते हैं । इनके द्वारा ही बुद्धि सूक्ष्म होकर ज्ञान का ग्रहण करनेवाली बनती है।
Connotation: - भावार्थ-प्राणसाधना द्वारा शरीर में सुरक्षित सोमकण हमारे शरीर व मस्तिष्क का अनुकूलता से निर्माण करते हैं और हमारे जीवनों में न क्षीण होनेवाले ज्ञानस्रोत को प्रवाहित करते हैं।