'मदच्युत् पुरुक्षु विश्वधायस्' धन
Word-Meaning: - [१] हे (मरुतः) = प्राणो ! आप (दिवः) = ज्ञान के प्रकाशवाले हो। आपकी साधना से ही ज्ञानदीप्ति बढ़ती है। [२] आप (नः) = हमारे लिये (रयिम्) = उस धन को (आ इयर्त) = सर्वथा प्राप्त कराओ जो (मदच्युतम्) = अभिमान को हमारे से दूर रखनेवाला है, (पुरुक्षुम्) = पालक पूरक अन्नोंवाला है तथा (विश्वधायसम्) = सबका धारण करनेवाला है। [२] धन में तीन ही दोष हैं- [क] अभिमान का पैदा हो जाना, [ख] भोगवृत्ति में पड़कर स्वादिष्ठ भोजनों में फँस जाना, [ग] अपनी ही भोग-सामग्री को बढ़ाते हुए धन का अपने सुख के लिये ही व्यय करना । प्राणसाधना के होने पर हम इन तीनों दोषों से बचे रहेंगे। यह साधना हमें धन का मद न होने देगी, हम पालक व पूरक सात्त्विक अन्नों का ही सेवन करेंगे। हम धन का विनियोग लोक हित के कार्यों में करेंगे।
Connotation: - भावार्थ- प्राणसाधना प्रकाश को प्राप्त कराती हुई हमें धन के साथ 'निरभिमानता, भोगों में अनासक्ति व लोकहित प्रवृत्ति' देती है।