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अनु॑ प्र॒त्नस्यौक॑सः प्रि॒यमे॑धास एषाम् । पूर्वा॒मनु॒ प्रय॑तिं वृ॒क्तब॑र्हिषो हि॒तप्र॑यस आशत ॥

English Transliteration

anu pratnasyaukasaḥ priyamedhāsa eṣām | pūrvām anu prayatiṁ vṛktabarhiṣo hitaprayasa āśata ||

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Pad Path

अनु॑ । प्र॒त्नस्य॑ । ओक॑सः । प्रि॒यऽमे॑धासः । ए॒षा॒म् । पूर्वा॑म् । अनु॑ । प्रऽय॑तिम् । वृ॒क्तऽब॑र्हिषः । हि॒तऽप्र॑यसः । आ॒श॒त॒ ॥ ८.६९.१८

Rigveda » Mandal:8» Sukta:69» Mantra:18 | Ashtak:6» Adhyay:5» Varga:7» Mantra:8 | Mandal:8» Anuvak:7» Mantra:18


HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

प्रियमेधासः, वृक्तबर्हिषः, हितप्रयसः

Word-Meaning: - [१] (प्रियमेधासः) = बुद्धि के साथ प्रेमवाले लोग (एषाम्) = इनके अर्थात् अपने (प्रत्नस्य ओकसः अनु) = सनातन गृह को लक्ष्य करके (वृक्तबर्हिषः) = हृदयरूप क्षेत्र को वासनारूप घास-फूस से रहित करते हैं । [२] ये (हितप्रयसः) = सदा हितकर प्रयासों [उद्योगों] में लगे हुए (पूर्वां) = सर्वमुख्य अथवा पालन व पूरण करनेवाली (प्रयतिं) = दान की प्रक्रिया को (अनु आशत) = व्याप्त करते हैं। सदा दानशील बनते हैं।
Connotation: - भावार्थ-ब्रह्मलोकरूप अपने सनातन गृह को प्राप्त करने के लिए आवश्यक है कि हम 'प्रियमेध' = बुद्धिप्रिय बनें। हृदयक्षेत्र में से हम वासनाओं के घास-फूस को उखाड़ डालें तथा सदा हितकर उद्योगों में लगे हुए हों। गतमन्त्र में वृणत दान की प्रक्रिया से ही ये वासनारूप शत्रुओं का खण्डन करनेवाले 'पुरुहन्मा' बनते हैं। अगले सूक्त का ऋषि यह 'पुरुहन्मा' ही है। इसकी प्रार्थना का स्वरूप है-

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - Of these devotees of yajna and lovers of meditative communion, those who sit on the holy grass with a clean mind and offer oblations of spiritual love in the style of the sages of old as ever achieve union with the universal presence of the eternal Spirit.