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न यु॒ष्मे वा॑जबन्धवो निनि॒त्सुश्च॒न मर्त्य॑: । अ॒व॒द्यमधि॑ दीधरत् ॥

English Transliteration

na yuṣme vājabandhavo ninitsuś cana martyaḥ | avadyam adhi dīdharat ||

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Pad Path

न । यु॒ष्मे इति॑ । वा॒ज॒ऽब॒न्ध॒वः॒ । नि॒नि॒त्सुः । च॒न । मर्त्यः॑ । अ॒व॒द्यम् । अधि॑ । दी॒ध॒र॒त् ॥ ८.६८.१९

Rigveda » Mandal:8» Sukta:68» Mantra:19 | Ashtak:6» Adhyay:5» Varga:4» Mantra:4 | Mandal:8» Anuvak:7» Mantra:19


SHIV SHANKAR SHARMA

Word-Meaning: - पुनः उसी विषय को अन्य प्रकार से कहते हैं। यह वर्णन समुदाय इन्द्रियों का है। (अतिथिग्वे) इस शरीर के निमित्त (सुरथान्) अच्छे रथयुक्त इन्द्रियरूप अश्वों को मैं प्राप्त करता हूँ (आर्क्षे) ईश्वरविरचित शरीर के हितार्थ (स्वभीशून्) अच्छे लगाम सहित इन्द्रियाश्वों को मैं प्राप्त होता हूँ। इसी प्रकार (आश्वमेधे) इन्द्रियाश्रय देह के मङ्गलार्थ (सुपेशसः) सुन्दर इन्द्रियाश्वों को मैं प्राप्त होता हूँ ॥१६॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

निरवद्य जीवन

Word-Meaning: - [१] गतमन्त्रों के अनुसार उत्तम इन्द्रियाश्वों व बुद्धि को धारण करनेवाले हे (वाजबन्धवः) = उत्तम भोजन व शक्ति को अपने साथ जोड़नेवाले पुरुषो! (युष्मे) = तुम्हारे में (निनित्सुः चन मर्त्यः) = निन्दा करने की इच्छावाला पुरुष भी (अवद्यम्) = पाप को (न अधि दीधरत्) = नहीं धारण कर पाता है। [२] तुम्हारा जीवन इस प्रकार प्रशस्त होता है कि तुम्हारे निन्दक भी तुम्हारी निन्दा नहीं कर पाते।
Connotation: - भावार्थ- सरल इन्द्रियाश्वों व आरोचमान बुद्धि को धारण करके हम इस प्रकार प्रशस्त जीवनवाले बनें कि हमारे शत्रु भी हमारी निन्दा न कर सकें। इस प्रकार निरवद्य जीवनवाले बनकर हम 'प्रियमेध' बनें। हमें 'यज्ञ व मेधा' ही प्रिय हो । यह प्रियमेध ही अगले सूक्त का ऋषि हैं-

SHIV SHANKAR SHARMA

Word-Meaning: - पुनस्तमेवार्थं प्रकारान्तरेणाह−आतिथिग्वे=अतिथिः परमात्मा गीयते येन शरीरेण सोऽतिथिगुः। स एवाऽऽतिथिगुः। तस्मिन्। सुरथान्। आर्क्षे=ऋक्षस्य पुत्रे शरीरे। स्वभीशून्। आश्वमेधे=शरीरे। सुपेशसः=सुरूपान्। आदद इति शेषः ॥१६॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - O brotherly team of dynamic workers and winners in the battles of life, no mortal even addicted to malignity and scandal can foist any blame or censure on you.