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उ॒रुं नृभ्य॑ उ॒रुं गव॑ उ॒रुं रथा॑य॒ पन्था॑म् । दे॒ववी॑तिं मनामहे ॥

English Transliteration

uruṁ nṛbhya uruṁ gava uruṁ rathāya panthām | devavītim manāmahe ||

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Pad Path

उ॒रुम् । नृऽभ्यः॑ । उ॒रुम् । गवे॑ । उ॒रुम् । रथा॑य । पन्था॑म् । दे॒वऽवी॑तिम् । म॒ना॒म॒हे॒ ॥ ८.६८.१३

Rigveda » Mandal:8» Sukta:68» Mantra:13 | Ashtak:6» Adhyay:5» Varga:3» Mantra:3 | Mandal:8» Anuvak:7» Mantra:13


SHIV SHANKAR SHARMA

Word-Meaning: - (गिर्वणस्तम) हे अतिशय स्तुतिस्तवनीय हे स्तोत्रप्रियतम देव ! (तम्+त्वाम्) जो तू सर्वत्र प्रसिद्ध और व्यापक है, उस तुझको (यज्ञैः) विविध शुभकर्मों के अनुष्ठान द्वारा (ईमहे) याचते और खोजते हैं। हे भगवन् ! (तम्) उस तुझको (गीर्भिः) स्व-स्व भाषाओं के द्वारा स्तुति करते हैं। (इन्द्र) हे निखिलैश्वर्य्यसम्पन्न महेश ! जिस कारण तू (यथाचित्) जिस किसी प्रकार से (वाजेषु) इन सांसारिक संग्रामों में (पुरुमाय्यम्) बहुज्ञानी पुरुष को अवश्य और सदा (आविथ) बचाता और सहायता देता है ॥१०॥
Connotation: - सर्व अवस्था में ज्ञान ही जन को बचाता है, अतः ज्ञानग्रहण का अभ्यास करना चाहिये ॥१०॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

विशालता [दूरदृष्टि]

Word-Meaning: - [१] हे प्रभो! (नृभ्यः) = मनुष्यों के लिए (उरुं पन्थाम्) = विशाल मार्ग की (मनामहे) = हम याचना करते हैं। सब मनुष्यों के साथ हम विशाल दृष्टिकोण से ही सारा व्यवहार करें। गो-गौओं के लिए भी (उरुं) [पन्थां मनामहे ] = हम विशाल मार्ग को अपनाएँ । दूरदृष्टि से ही उनकी उपयोगिता को सोचें। उनके दूध में थोड़े से मक्खन की कमी हमें भैंस के दूध के प्रति प्रेमवाला न बना दे। [२] हम (रथाय) = अपने शरीररूप रथ के लिए भी (उरुं पन्थाम्) = विशाल मार्ग को (मनामहे) = माँगते हैं, अर्थात् हमारे सारे व्यवहार दीर्घदृष्टि से ही किये जाएँ। इस प्रकार देववीतिं दिव्यगुणों की प्राप्ति की - दिव्यगुणों की प्राप्ति के साधनभूत यज्ञों की हम कामना करते हैं।
Connotation: - भावार्थ- सब मनुष्यों के साथ हमारा व्यवहार विशाल मन से हो। गौवों के विषय में हमारी दृष्टि दूर के हित को सोचनेवाली हो। शरीर के विषय में दूरदृष्टि से प्रत्येक क्रिया को करें। दिव्यगुणों की प्राप्ति के लिए यत्नशील हों।

SHIV SHANKAR SHARMA

Word-Meaning: - हे गिर्वणस्तम=गीर्भिः स्तुतिभिः प्रशंसनीयतम इन्द्र ! तं सर्वत्र सुविख्यातम्। त्वा=त्वाम्। यज्ञेभिः=यज्ञैर्यागैः। ईमहे=मार्गयामः। गीर्भिः=स्वस्ववचनैश्च तं त्वां स्तुमः। हे इन्द्र ! त्वम्। यथाचित्=येन केनापि प्रकारेण। वाजेषु=संग्रामेषु। पुरुमाय्यम्=बहुमायम्=बहुज्ञानयुक्तं पुरुषम्। सदा त्वमाविथ=रक्षसि ॥१०॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - Rise and advancement for the people, expansion and development for lands and cattle, expansion and improvement of highways for transport, we pray for, and for that we think and research and plan, and we seek the favour of divinity.